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बिहार के बांका में बाबा के निकली सींग

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बांका. इसे कुदरत का करिश्मा कहें या शारीरिक विकृति, समझ में नहीं आता. बिहार के बांका जिले में एक 96 वर्षीय बुजुर्ग के सिर पर तीन इंच लंबा सींग उग आया है. बकरे या अन्य जानवरों के सींगों की तरह ही यह भी मजबूत और नुकीला है. इस अजूबे ने स्थानीय चिकित्सकों को भी हैरत में डाल रखा है. वे भी इसे अपनी तरह का अद्भुत मामला मान रहे हैं. जानकारी के अनुसार अमरपुर प्रखंड के सलेमपुर गांव के जगदीश कापरी के सिर पर यह सींग निकला है। यह सींग सिर के एक तरफ बाएं हिस्से में है. कापरी ने बताया कि छह महीने पहले सर्दियों के दौरान उन्हें सिर के बीच में सींग विकसित होने का एहसास हुआ. जगदीश के रिश्तेदार राजीव कापरी ने बताया कि सर्दियों में जगदीश की ऊनी टोपी फाड़कर सींग बाहर निकल आया. इसके बाद सबका ध्यान इस ओर गया. जगदीश का कहना है कि उन्हें सींग से कोई विशेष तकलीफ नहीं है. मगर, सिर पर असामान्य रूप से सींग निकलने से वे सहमे हुए हैं. स्थानीय चिकित्सकों से भी समस्या पर बात की गई. सभी पसोपेश में पड़ गए. जगदीश की उम्र के मद्देनजर चिकित्सक शल्य क्रिया कर सींग हटाने से भी परहेज कर रहे हैं. इस बाबत सिविल सर्जन ड...

आखिर क्यों ?

आखिर क्यों ? कोई उनपर कार्यवाही क्यों नहीं करता जो देश के खजाने से पैसा तो जमकर लेते हैं मगर काम कौड़ियों का भी नहीं करते. इसकी शिकायत करने पर दो चार तर्क ठोंक देते हैं . क्या ऐसे लोग देश के दुश्मन नहीं हैं? जो लोग अपनी जेबें भरने के लिए खाद्य पदार्थों में मिलावट करते हैं और उसको पैसे देकर खरीद कर खाने वाले की जान चली जाती है तो क्या ये हत्या नहीं है? अगर है तो उसपर कोई कार्यवाही क्यों नहीं करता. उनपर कोई कार्यवाही क्यों नहीं करता जो देश के लाखों किसानों की आत्महत्या के जिम्मेदार हैं? आखिर क्यों कोई उनपर कार्यवाही नहीं करता जो पूरा वेतन लेने का बाद भी किसी गरीब की जेब पर नज़र रखते है। आखिर क्यों इनको सजा देने के नाम पर क़ानून के हाथ कांपते हैं .

सरकार का आइडिया ?

पहले सरकार उद्द्योगपतियों का जमीन देने का विरोध करती है. फिर डीजल,पेट्रोल और रासायनिक खादों  व बीजों के दाम बढाती है।इसके बाद हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जी और वित्त मंत्री जी  कागजों पर फर्जी आंकड़ों के घोड़े दौडाते हैं . किसानों की आत्महत्याओं में आज भी कोई कमीं नहीं आई है. इसका कारण है की एक एकड़ गेहूं की खेती में लगभग  अट्ठारह हजार की लगत आती है और उसमें बामुश्किलन पंद्रह क्विंटल गेहूं पैदा होता है. जिसकी बाजार में कुल कीमत पंद्रह हजार रुपये होती है यह भाव यूपी के बाजारों का है. अब कोई विद्द्वान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से ये पूंछेगा की सरकार ऐसा क्यों कर रही है? आइये हम बताते हैं सरकार की मंशा उद्द्यागों को बढ़ने की है, ऐसे में यही एकमात्र रास्ता बचता है जिसके माध्यम से कृषी भूमि उद्द्योगपतियों को आसानी से दी जा सकती है. क्योंकि किसान जब खेती से ऊबेगा तभी तो जमीन बेंचेगा? क्यों कैसा है येपहले सरकार उद्द्योगपतियों का जमीन देने का विरोध करती है. फिर डीजल,पेट्रोल और रासायनिक खादों  व बीजों के दाम बढाती है।इसके बा...

नई दिल्ली से प्रकाशित सरस सलिल में प्रकाशित मेरी खबर

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दैनिक भास्कर के पानीपत अंक में प्रकाशित मेरी खबर

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दैनिक भास्कर के कई अंकों में एक साथ में प्रकाशित मेरी खबर

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दैनिक राजस्थान पत्रिका के जयपुर अंक में प्रकाशित मेरी खबर

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