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गौरव गाथा महतारी के (छत्तीसगढ़ी कविता )

ये नाग मन के धरती जिंकर ले नग घलो थररात रिहिस। फणीं अऊ छिन्दक राजा मन के ध्वज हा लहरात रिहिस।। पाण्डव के पार्थ पौत्र परीक्षित ल जेन हा ललकारिन। लड़त मेरठ के तीर रण में तक्षक हा उनला मारिस।। अड़बड़ वीर मन के धरती ये छत्तीसगढ़ महतारी हे। ज्ोमां रत्न भरे खान, सरल-सुघर- सुन्दर सुजानी हे।। अइसन मनखे के माटी में बारुद बोवत हे मक्कार। अइसन मनखे के चिंहारी कर करना हे नक्कार।। ये वीरनारायण की धरती दाऊ दयाल के माटी हे। इंकर रक्षा हित बर मिटना वीर मन के परिपाटी हे।। मांदर के थाप सुनके इहां शेर के टांग घलो कांपथे। आदिवासी के तीर विरोधी के देह घलो वोहा नापथे ।। काबर येमन भोला-भाला के मन मा जहर घोरथें। लोहा के सिक्का के बल मा ईमान ला तोलथें।। अउ कतका दिन तुमन अइसने कटवाहू? जेन दिन सब संभलहीं कुटका में बंट जाहू।। वो दिन माटी के बेटा धरती के करजा उतारहीं। अउ खोज-खोज के सब मक्कार ला मारहीं।। जंगल मा कोयली मैना पंख अपन फहराही। धरती धान के बाली ले चारों मुड़ा लहराही।। ताला के रुद्र छोड़ ताण्डव तब मंद-मंद मुस्काहीं। छत्तीसगढ़ के वासी कपूत जनगणमन ला गाहीे।। द

काम आई सहायता

अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद् ने एक कपूत को विकलांग स्कूटर वाहन प्रदान किया । जिससे अब मैं चलने लायक हो गया । इसके लिया विकलांग चेतना परिषद् के प्रांतीय अध्यक्ष रामानंद अग्रवाल जी डॉ डीपी अग्रवाल भैया सत्येन्द्र अग्रवाल, अनुराधा दुबे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वीरेंद्र पाण्डेय व मेरे बड़े भैया गिरीश पंकज तथा डॉ सुधीर शर्मा जी सहित तमाम मित्रों ने भरपूर सहयोग किया । इसके लिया रायपुर के प्रेस क्लब के सभी भाइयों हरिभूमि परिवार , व शुभचिंतकों का हार्दिक आभार । धन्यवाद

गौरव गाथा महतारी की

यह धरती नागों की धरती जिनसे नग भी थहराते थे, जहां फणीं और छिन्दक राजाओं के ध्वज ही लहराते थे। पाण्डव के पार्थ पौत्र परीक्षित को जिसने ललकारा था, मेरठ के निकट हुए रण में तक्षक ने उनको मारा था।। उनके साहस से सहमें साधू उन्हें सर्प बतलाते हैं, भागवत में क्षेपक जोड़ हमें यह कल्पित कथा सुनाते हैं। तोपों तीरों का साथ और तेगों से जिनकी यारी है, ऐसे ही वीरों की माता यह छत्तिसगढ़ महतारी है।। जिसमें रत्नों की भरी खान, कुछ सरल सुघर सुन्दर सुजान, आगन्तुक को भगवान मान, करते उनकी सेवा सम्मान। ऐसे मनखों की माटी में बारूद बो रहे मक्कारों, नाकों के बल बजने वाले नक्सल के नकली नक्कारों।। यह वीरनारायण की धरती दाऊ दयाल की माटी है, इसकी रक्षा हित मिट जाना इन वीरों की परिपाटी है। मांदर की थापें सुन जिनकी शेरों की टांग कांपती है, जिन आदिवासियों की तीरें बाघों की देह नापती हैं।। तुम उन भोले-भाले लोगों के मन में जहर घोलते हो, कुछ लोहे के सिक्कों के बल पर उनका ईमान तोलते हो। मुझको मेरे ही लालों से कितने दिन तुम कटवाओगे, जिस दिन ये सम्भल गए उस दिन तुम टुकड़ों में बंट जाओगे।। उस दिन इस माटी का बेटा धरती का कर्ज उतारे...

दो चौके कपूत के

ग़ज़ल हो गई इसने तोड़ा सहारा ग़ज़ल हो गई । उसने तुमको दुलारा ग़ज़ल हो गई॥ प्रेमिका ने "कपूत" एक दिन प्यार से । हमको दो लात मारा ग़ज़ल हो गई ॥ लिख दिया तुमने चलो अच्छा हुआ हमको नकारा लिखा दिया तुमने । एक झटके में ही सीधे आवारा लिखा दिया तुमने ॥ हमारे आठ बच्चे और उनकी बीस खालायें । बताओ हमको फिर कैसे कुंवारा लिखा दिया तुमने ?

एक कता

गोंद में बैठ ऊधम मचाते रहे, भाई -भाई के जिनसे ही नाते रहे । सूई उनको लगी चीखता मैं रहा , मेरी गर्दन कटी मुस्कुराते रहे ॥

एक छंद

पानी में पड़े मगर न धुआं दे उबाल खाए , फेंकिये निकाल के तुरंत ऐसे चून को । रक्षा न गरीब की हो दुष्टों को न दंड मिले , आग में जला देन मित्र आप उस कानून को ॥ दोस्ती का हाथ तो बढ़ाये चले जा रहे हैं , देख नहीं पा रहे हैं उसके नाखून को । घाटियों की चीख पे उबाल खा न आँख चढ़े , मेरा है प्रणाम ऐसे नेताजी के खून को ॥

ग़ज़ल

जो कुछ हम सोच न पायें वही अक्सर निकलते हैं । यहाँ तो रहजन भी बनके अब रहबर निकलते हैं ॥ ये ऊंचे अम्बार कूड़े के न घबरा देख कर भाई । सफाई करके देखोगे की इसमे घर निकलते हैं ॥ चले थे पूजने जिनको मसीहा शान्ति का माना । उन्हीं की जेब से छूरे और खंज़र निकलते हैं ॥ न जाने किस ने तोड़े उनके शीशों के महल साहब । यहाँ तो टेंट से लूलों के अब पत्थर निकलते हैं।। तुम्हें जंगल में जाने की "कपूत" अब क्या जरूरत है। यहाँ तो दिन में ही सडकों पे अब अजगर निकलते हैं ॥