Saturday, November 28, 2009
चौथेपन का दर्द
शिवसेन प्रमुख बालठाकरे को अब तो अपने ही परिवार में विरोध झेलना पडेगा । वह भी किसी और से नहीं बल्कि अपनी ही पुत्रवधू स्मिता ठाकरे से । अगर कांग्रेस की मानें तो शिसेना के कार्यकर्ताओं को बालठाकरे को छोड़ कर किसी अन्य पर भरोसा ही नहीं है । ऐसे में स्मिता ने सारे विकल्प खुले रखे हैं । अब तो देश का हर आदमी यही कहेगा कि अपना घर तो सम्हालता नहीं चले हैं महाराष्ट्र सम्हालने ? ठाकरे साहब हिन्दी भाषियों पर तो खूब हेकड़ी दिखाई अब ज़रा अपने बहू को सम्हाल कर दिखाओ । जो घर नहीं सम्हाल सकता वह राज्य क्या सम्हालेगा ।
Thursday, November 26, 2009
पतन का एहसास
शहर के धनकुबेर दौलतराम धाकड़ चंद ने मुझे बताया कि मह्यं हेहर हिन्दी दैनिक के नाम से एक अखबार निकाल रहा हूँ। जिसके संपादक आप होंगे। सुनते ही जीवन में पहली बार मुझे अपनी विद्वत्तता पर गर्व होने लगा। मेरा मन कल्पना के आकाश में सूर्यकिरण विमानों की तरह कलाबाजियां खाने लगा। देखते ही देखते शहर के तमाम थेथर पत्रकारों के लम्बे चौडे व्यौरों वाले आवेदन आने लगे। जो कभी मेरे प्रणाम का उत्तर तक नहीं देते थे। वे साष्टांग दण्डवत करने लगे। पहली बैठक में मैंने पिछले दरवाजे से चयनित संवाददाताओं को बुलाया। बैठक में जैसे ही हिन्दी में समाचार लेखन की बात आई। तो कुछ पत्रकारों ने दी अंग्रेजी की दुहाई। कुछ ने पत्रकारिता की अलग भाषा की वकालत की। भाषा का मापदण्ड तय करते -करते अचानक बात इतनी बिगड़ी कि पता नहीं कब बाहर छिपाकर रखे दण्ड और पादुकाएं हॉल में चलने लगीं। पूरा हॉल महाराष्टÑ का विधान सभा भवन बन गया। इस आकस्मिक संकट में मेरी उपस्थित बुध्दि काम आई। सेठ जी को आलमारी में बंदकर, मैंने शौचालय में छिपकर अपनी जान बचाई। जब हॉल में पसर गया सन्नाटा तब मैंने शौचालय को कहा बॉय-बॉय टाटा। वहां का दृश्य रंगीन था, मेरे 25 संवाददाताओं में से 16 घायल और 9 बेहोश थे। यह देख मेरा संयम थोड़ा डोला। मैंने बेहोश पडे साथियों की नब्ज टटोला। घायलों को पिछले दरवाजे से नर्सिंग होम भेजवाया। बेहोश पड़े, सदमाग्रस्तों पर मिनरल वाटर का छिड़काव करवाया। जिनके थोबड़े सूज आए थे, उनकी फोटो फाइल से तथा बेहोश साथियों की ओरिजनल फोटो लगी विज्ञप्ति जारी करवाया। जिसमें बैठक को सफल बताया।
हालांकि उनके प्रथम दर्शन और प्रदर्शन से भारतीय पत्रकारिता पर क्या असर पड़ा यह सोचकर मेरा अंतर्मन बहुत रोया। रात को जब मैं सोया तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने मुझे दुत्कारा, विष्णुकांत शास्त्री ने धिक्कारा, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मुझे घसीटा,प्रभाष जोशी ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। जब इससे पहले के पत्रकारों व संपादकों के बारे में पूंछा तो पता चला कि वे मेरी इस हरकत से पीड़ित होकर आत्महत्या करने चले गए हैं। वहीं चौथास्तंभ अपने चौथेपन पर सुबक-सुबक कर रो रहा था। यह देखकर मेरा सिर जोर से चकरा गया। मह्यं धड़ाम से चौकी से नीचे आ गया। इस गिरने के क्रम ने मुझे मेरे पतन का तो एहसास करा दिया। लेकिन मेरे भाइयों को भगवान जाने कब इसका एहसास होगा। अंत में मह्यं तो यही कहना चाहता हूं कि —
गुनहगारों में शामिल हूं गुनाहों से नहीं वाकिफ।
सजा तो जानते हैं हम खुदा जाने खता क्या है।।
हालांकि उनके प्रथम दर्शन और प्रदर्शन से भारतीय पत्रकारिता पर क्या असर पड़ा यह सोचकर मेरा अंतर्मन बहुत रोया। रात को जब मैं सोया तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने मुझे दुत्कारा, विष्णुकांत शास्त्री ने धिक्कारा, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मुझे घसीटा,प्रभाष जोशी ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। जब इससे पहले के पत्रकारों व संपादकों के बारे में पूंछा तो पता चला कि वे मेरी इस हरकत से पीड़ित होकर आत्महत्या करने चले गए हैं। वहीं चौथास्तंभ अपने चौथेपन पर सुबक-सुबक कर रो रहा था। यह देखकर मेरा सिर जोर से चकरा गया। मह्यं धड़ाम से चौकी से नीचे आ गया। इस गिरने के क्रम ने मुझे मेरे पतन का तो एहसास करा दिया। लेकिन मेरे भाइयों को भगवान जाने कब इसका एहसास होगा। अंत में मह्यं तो यही कहना चाहता हूं कि —
गुनहगारों में शामिल हूं गुनाहों से नहीं वाकिफ।
सजा तो जानते हैं हम खुदा जाने खता क्या है।।
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Monday, November 23, 2009
पिस्तौल मांगता बचपन और हाशिए पर सदाचार
पहले बच्चे गुड़िया, गुड्डे व लकड़ी या मिट्टी के खिलौनों के लिए रोते थे। समाज में हिंसा, आत्महत्या, बलात्कार जैसी चीजें न के बराबर हुआ करती थीं। लोगों में अपनत्व की भावना रहती थी। गांव में एक छप्पर उठाने के लिए हर कोई कंधा लगा देता था। लोग अनुशासित ढंग से रहते थे। मसलन किसी को देखकर प्रणाम करना,जाते समय गांव के बाहर तक जाकर विदा करना आदि प्रथाएं प्रचलन में थीं।
बदलते परिवेश और पाश्चात्य सभ्यता तथा चीनी खिलौनों ने बच्चों को इस कदर बिगाड़ दिया है कि अब का बच्चा बाप से पिस्तौल के लिए झगड़ा करता है। या यूं कहें कि लेकर ही दम लेता है। अश्लील वीडियोगेम्स का मायाजाल जो है सो अलग। परिणामत: लगभग दो दशक पहले हमारे पाठ्यक्रमों से श्यामनारायण पाण्डेय, महाकवि भूषण, रामधारी सिंह दिनकर की ओज की कविताओं को आउटडेटेड करार देकर विदा कर दिया गया। उनके बदले अल्लम गल्लम साहित्य बच्चों के सामने परोसा जा रहा है। ऐसे में बच्चों का बिगड़ना स्वाभाविक है।
कहते हैं बच्चे देश का भविष्य हैं अब उनके बिगड़ने से हमारा वर्तमान खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। क्योंकि इस बढ़ती हिंसा, पढ़ाई के प्रति अरुचि यह इस पीढ़ी को कहां ले जाएगी, भगवान जाने!
बदलते परिवेश और पाश्चात्य सभ्यता तथा चीनी खिलौनों ने बच्चों को इस कदर बिगाड़ दिया है कि अब का बच्चा बाप से पिस्तौल के लिए झगड़ा करता है। या यूं कहें कि लेकर ही दम लेता है। अश्लील वीडियोगेम्स का मायाजाल जो है सो अलग। परिणामत: लगभग दो दशक पहले हमारे पाठ्यक्रमों से श्यामनारायण पाण्डेय, महाकवि भूषण, रामधारी सिंह दिनकर की ओज की कविताओं को आउटडेटेड करार देकर विदा कर दिया गया। उनके बदले अल्लम गल्लम साहित्य बच्चों के सामने परोसा जा रहा है। ऐसे में बच्चों का बिगड़ना स्वाभाविक है।
कहते हैं बच्चे देश का भविष्य हैं अब उनके बिगड़ने से हमारा वर्तमान खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। क्योंकि इस बढ़ती हिंसा, पढ़ाई के प्रति अरुचि यह इस पीढ़ी को कहां ले जाएगी, भगवान जाने!
सस्ती लोकप्रियता हासिल कारने का मंत्र
यह कोई नई बात नहीं है कि राज ठाकरे ने विधान सभा भवन में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हिंदी में शपथ लेने वाले को अपने पालतू गुंडों से पिटवाया, बल्कि उसे पीटने वालों को सम्मानित भी करवाया गया। शिवसेना के महानायक बालासाहब ठाकरे ने भी उन्हीं का अंधा अनुकरण करते हुए सचिन को चुनौती तक दे डाली।
ठीक तीन दशक पहले यही काम उत्तर प्रदेश में मायावती ने किया था। जब उन्होंने महात्मा गांधी को शैतान की औलाद कहकर विवाद खड़ा कर दिया था। उस समय भी इसकी खूब निंदा हुई थी। लेकिन दोनों ही घटनाओं के पीछे उद्देश्य एक ही है। सस्ती प्रसिध्दि पाना। बाद में माफी मांगकर मामले को रफादफा करना तो परंपरा बन गई है। किसी को सभा में जमकर पीट लेने के बाद गली में जाकर हाथ जोड़ लेना। इनकी फितरत बन गई है। यह सिर्फ घटिया राजनीति के कुछ टेलर हैं असली फिल्म तो अभी बाकी है। क्योंकि अब लोग यह भूलते जा रहे हैं। कि हम त्यागवादी भूमि पर निवास करते हैं। जहां हमारे आदर्श होते हैं हम जिनका अनुकरण करते हैं। तो कहीं न कहीं आने वाली पीढ़ी में कोई और राज ठाकरे से भी क्रूर व्यक्ति पैदा हो जाए। इसमें किंचित संदेह नहीं होना चाहिए।
बड़े भाई हुल्लड़ मुरादाबादी की ये पंक्तियां बिल्कुल प्रासंगिक हैं कि:-
देश को यह राजनीति पाप तक ले जाएगी।
या घुटन के रास्ते संताप तक ले जाएगी।।
गर यही हालत रहे तो चंद वोटों के लिए ।
सभ्यता खुद को पकड़कर सांप तक ले जाएगी।।
ठीक तीन दशक पहले यही काम उत्तर प्रदेश में मायावती ने किया था। जब उन्होंने महात्मा गांधी को शैतान की औलाद कहकर विवाद खड़ा कर दिया था। उस समय भी इसकी खूब निंदा हुई थी। लेकिन दोनों ही घटनाओं के पीछे उद्देश्य एक ही है। सस्ती प्रसिध्दि पाना। बाद में माफी मांगकर मामले को रफादफा करना तो परंपरा बन गई है। किसी को सभा में जमकर पीट लेने के बाद गली में जाकर हाथ जोड़ लेना। इनकी फितरत बन गई है। यह सिर्फ घटिया राजनीति के कुछ टेलर हैं असली फिल्म तो अभी बाकी है। क्योंकि अब लोग यह भूलते जा रहे हैं। कि हम त्यागवादी भूमि पर निवास करते हैं। जहां हमारे आदर्श होते हैं हम जिनका अनुकरण करते हैं। तो कहीं न कहीं आने वाली पीढ़ी में कोई और राज ठाकरे से भी क्रूर व्यक्ति पैदा हो जाए। इसमें किंचित संदेह नहीं होना चाहिए।
बड़े भाई हुल्लड़ मुरादाबादी की ये पंक्तियां बिल्कुल प्रासंगिक हैं कि:-
देश को यह राजनीति पाप तक ले जाएगी।
या घुटन के रास्ते संताप तक ले जाएगी।।
गर यही हालत रहे तो चंद वोटों के लिए ।
सभ्यता खुद को पकड़कर सांप तक ले जाएगी।।
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राजनीति
Saturday, November 21, 2009
चौथे स्तंभ पर हावी राजनीति
बहके लोगों की बचकानी बातें
मनसे द्वारा की जाने वाली पंजीकृत गुंडागर्दी पर शिवसेना ने भी न केवल अपनी मुहर लगा दी। बल्कि आईबीएन 7 के कार्यालय में पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। जिसका जीवंत प्रसारण भी दिखाया गया। इसके बाद शुरू हुआ थू-थूकरण का वही पुराना दौर। जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम होगी। क्योंकि बहके लोग ही ऐसी बचकानी बातें करते हैं। इसके लिए जिम्मेदार जितने वे मराठी मानुस हैं। उससे ज्यादा वहां रहने वाले हिंदी भाषी व भोजपुरी भाषी लोग हैं। क्योंकि इनका विरोध मर चुका है। या यूं कहें कि हिंदी भाषी समाज मर चुका है। तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कहां गए वे आग उगलने वाले पत्रकार? जिनकी लेखनी से निकलने वाले शरारों से बडे से बड़े राजनेता कांप जाया करते थे।
इतने बड़े- बड़े लोगों के रहते इन तीन कौड़ी के नकारा नेताओं की ये मजाल? लेकिन यह सा बातें तो जिंदा लोग समझते हैं मुर्दों को आप क्या समझाएंगे? अगर समझते तो सारे हिंदी भाषी समाज के लोग उन लोगों को यह भी तो कह सकते थे। कि ठीक है यहां कोई हिंदी भाषी नहीं रहेगा। लेकिन दुनिया से मराठी मानुस तुम महाराष्ट्र में भुला लो। इसके अलावा हिंदी भाषियों की जो भी चल- अचल संपत्ति है, उसकी कीमत तुरंत दे दो। हम चले जाएंगे। लेकिन वहां के हिंदी भाषियों को अपने व्यवसाय, अपनी नौकरी, देखने से फुर्सत ही नहीं है। फिर कौन उनकी हिफाजत करे? बकरा हमेशा इसी लिए काटा जाता है कि वह कमजोर होता है।
लेकिन आज तक किसी को शेर काटते हुए नहीं देखा। वहीं मीडिया ने भी अपनी कलम की कीमत खूला वसूली है। लिहाजा यह तो होना ही था। आ अगर जरा सी भी गैरत बची हो तो हर हिंदी भाषी का यह नैतिक कर्तव्य जानता है कि राष्ट्रभाषा के धुर विरोधी लोगों पर देश के सथी न्यायालयों में राष्टÑद्रोह का प्रकरण दर्ज कराया जाए। मुकदमों की तादाद इतनी हो कि इनकी बाकी की जिंदगी अदालत के चक्कर लगाते हुए बीते। नहीं तो चौथे स्तंभ के वे तथाकथित धाकड़ पत्रकार यह सच स्वीकारें कि वे कलम की कत्ल के अभियुक्त हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि :-
काव्य की संभावना से युक्त हैं, इस लिए हर दोष से हम मुक्त हैं।
वर्ना उस वरदायिनी के कठघरे में, हम कलम की कत्ल के अभियुक्त हैं।।
मनसे द्वारा की जाने वाली पंजीकृत गुंडागर्दी पर शिवसेना ने भी न केवल अपनी मुहर लगा दी। बल्कि आईबीएन 7 के कार्यालय में पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। जिसका जीवंत प्रसारण भी दिखाया गया। इसके बाद शुरू हुआ थू-थूकरण का वही पुराना दौर। जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम होगी। क्योंकि बहके लोग ही ऐसी बचकानी बातें करते हैं। इसके लिए जिम्मेदार जितने वे मराठी मानुस हैं। उससे ज्यादा वहां रहने वाले हिंदी भाषी व भोजपुरी भाषी लोग हैं। क्योंकि इनका विरोध मर चुका है। या यूं कहें कि हिंदी भाषी समाज मर चुका है। तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कहां गए वे आग उगलने वाले पत्रकार? जिनकी लेखनी से निकलने वाले शरारों से बडे से बड़े राजनेता कांप जाया करते थे।
इतने बड़े- बड़े लोगों के रहते इन तीन कौड़ी के नकारा नेताओं की ये मजाल? लेकिन यह सा बातें तो जिंदा लोग समझते हैं मुर्दों को आप क्या समझाएंगे? अगर समझते तो सारे हिंदी भाषी समाज के लोग उन लोगों को यह भी तो कह सकते थे। कि ठीक है यहां कोई हिंदी भाषी नहीं रहेगा। लेकिन दुनिया से मराठी मानुस तुम महाराष्ट्र में भुला लो। इसके अलावा हिंदी भाषियों की जो भी चल- अचल संपत्ति है, उसकी कीमत तुरंत दे दो। हम चले जाएंगे। लेकिन वहां के हिंदी भाषियों को अपने व्यवसाय, अपनी नौकरी, देखने से फुर्सत ही नहीं है। फिर कौन उनकी हिफाजत करे? बकरा हमेशा इसी लिए काटा जाता है कि वह कमजोर होता है।
लेकिन आज तक किसी को शेर काटते हुए नहीं देखा। वहीं मीडिया ने भी अपनी कलम की कीमत खूला वसूली है। लिहाजा यह तो होना ही था। आ अगर जरा सी भी गैरत बची हो तो हर हिंदी भाषी का यह नैतिक कर्तव्य जानता है कि राष्ट्रभाषा के धुर विरोधी लोगों पर देश के सथी न्यायालयों में राष्टÑद्रोह का प्रकरण दर्ज कराया जाए। मुकदमों की तादाद इतनी हो कि इनकी बाकी की जिंदगी अदालत के चक्कर लगाते हुए बीते। नहीं तो चौथे स्तंभ के वे तथाकथित धाकड़ पत्रकार यह सच स्वीकारें कि वे कलम की कत्ल के अभियुक्त हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि :-
काव्य की संभावना से युक्त हैं, इस लिए हर दोष से हम मुक्त हैं।
वर्ना उस वरदायिनी के कठघरे में, हम कलम की कत्ल के अभियुक्त हैं।।
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राजनीति
Monday, October 5, 2009
ग़ज़ल
परिंदा आस का देखो उड़ान छोड़ गया !
आख़िरी संग भी जैसे ढलान छोड़ गया !!
जिन्हें समझे थे आकाए-आशियाना यहाँ !
कल वही शख्स ही अपना माकन छोड़ गया !!
शेर तो आया था मरने के वास्ते लेकिन !
इस से पहले ही शिकारी मचान छोड़ गया !!
अकब में आग का दरिया है सामने जंगल!
किस इम्तहां में मेरा मेहरबान छोड़ गया !!
"कपूत "उस काली हवेली में न जाने क्या था !
कि जो भी ठहरा वो आख़िर ईमान छोड़ गया !!
आख़िरी संग भी जैसे ढलान छोड़ गया !!
जिन्हें समझे थे आकाए-आशियाना यहाँ !
कल वही शख्स ही अपना माकन छोड़ गया !!
शेर तो आया था मरने के वास्ते लेकिन !
इस से पहले ही शिकारी मचान छोड़ गया !!
अकब में आग का दरिया है सामने जंगल!
किस इम्तहां में मेरा मेहरबान छोड़ गया !!
"कपूत "उस काली हवेली में न जाने क्या था !
कि जो भी ठहरा वो आख़िर ईमान छोड़ गया !!
Wednesday, September 23, 2009
कृषि प्रधान देश (व्यंग्य )
उनके सब्र की उस दिन फूट गयी गगरी ,
जब दो रोटी की खातिर ,
बिकी बेचारी डंगरी ,
ब्याज की एवज में जवान बेटी को
ले गया साहूकार !
तब किसी को नहीं सुनाई दी ममता की सिसकियाँ ,
मानवता का चीत्कार !दवावों के अभाव में माँ को आ रही खांसी !
कर्ज में डूबे बाप ने जवान बेटों के साथ लागाली फांसी !
जानवरों को उठा ले कसाई !
घर छोड़कर भाग गया छोटा भाई !!
कमर झुकाए सत्तर साल की दादी !
अदालत के चक्कर लगा रही है बनकर फरियादी !
मैले टुकड़े में बंधी सुखी रोटियाँ और एक छोर पर बंधा कुछ पैसा !
घर में बंचा एक अदद भैंसा !!
उस बूढी इतवारी बाई को वकील फटकारता है
पेशकार गुर्राता है ! कोर्ट का चपरासी भी पचास रुपये के लिए मुंह बनाता है !
सत्तर सालों से चल रहा मुकदमा आज फिर हुआ पेश है !
और सात हजार किसानो की आत्महत्या के बाद प्रधानमंत्री जी पत्रकारवार्ता में कहते हैं की भारत एक कृषि प्रधान देश है! कृषि प्रधान देश है !!
जब दो रोटी की खातिर ,
बिकी बेचारी डंगरी ,
ब्याज की एवज में जवान बेटी को
ले गया साहूकार !
तब किसी को नहीं सुनाई दी ममता की सिसकियाँ ,
मानवता का चीत्कार !दवावों के अभाव में माँ को आ रही खांसी !
कर्ज में डूबे बाप ने जवान बेटों के साथ लागाली फांसी !
जानवरों को उठा ले कसाई !
घर छोड़कर भाग गया छोटा भाई !!
कमर झुकाए सत्तर साल की दादी !
अदालत के चक्कर लगा रही है बनकर फरियादी !
मैले टुकड़े में बंधी सुखी रोटियाँ और एक छोर पर बंधा कुछ पैसा !
घर में बंचा एक अदद भैंसा !!
उस बूढी इतवारी बाई को वकील फटकारता है
पेशकार गुर्राता है ! कोर्ट का चपरासी भी पचास रुपये के लिए मुंह बनाता है !
सत्तर सालों से चल रहा मुकदमा आज फिर हुआ पेश है !
और सात हजार किसानो की आत्महत्या के बाद प्रधानमंत्री जी पत्रकारवार्ता में कहते हैं की भारत एक कृषि प्रधान देश है! कृषि प्रधान देश है !!
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