सियासत और सांसत





सियासत किस तरह दो$गली हो चली है। इसको अगर देखना है तो आप बस्तर चले जाइए। जहां आदिवासियों की जिंदगी नरक बन चुकी है। कहने को तो इनको राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है, मगर उन्हीं को जब नक्सली पुलिस के साथ मु$खबिरी का झूठा आरोप लगाकर बकरे की तरह काट कर चले जाते हैं। तो इन गरीबों की सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता। जैसे ही हमारे सुरक्षा बलों के जवान किसी मुठभेड़ में दस-बीस नक्सलियों को मार गिराते हैं। तो उसकी धमक राजधानी में साफ-साफ सुनाई देती है। थोक में तथाकथित साहित्यकार और बुध्दिजीवी, मानवाधिकार वादी झोला लटकाए,इंकलाब जिंदाबाद करने लगते हैं। इनसे कोई ये नहीं पूछता कि क्या वो निर्दोष आदिवासी आदमीं नहीं था? उसका दोष क्या था? क्यों की गई उसकी सरेआम हत्या?
शासन-प्रशासन के मंत्री और नेता दिल्ली जाकर आदिवासी राज्य होने का रोना केंद्र सरकार के सामने रोते हैं। फिर योजनाओं के नाम पर मिलने वाली लंबी रकम को खजाने में ढोते हैं। उसके बाद फिर इसी नदी में जमकर अपने चहेते ठेकेदारों के साथ मिलकर लगाते गोते हैं। असल आदमी तक उसका ह$क नहीं पहुंच पाता। वो पहले भी अभावों में था, आज भी अभावों में है और भविष्य में उसको इससे निजात मिल जाएगी ऐसी कोई गारंटी नहीं है। संविधान में वर्णित मूलभूत अधिकारों तक को उन्हें नहीं दिया जा रहा है। हद तो तब हो जाती है जब उनके निर्दोष बच्चों को ही माओवादी बताकर कुछ सुरक्षाबलों के जवान मार देते हैं। अब कोई कैसे प्रमाणित करे कि वो माओवादी नहीं है? जब काननू के रखवाले ही उसको नक्सली बताने पर तुले हों?
कुल मिलाकर व्यवस्था की अवस्था बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इन आदिवासियों के लिए तो किसी की भी मानसिकता ठीक नहीं लगती। उनकी हालत उसी पके पपीते जैसी हो गई है कि जिसके लिए मेज का कोना भी चाकू का काम कर जाता है। सरकार आदिवासियों को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है। तो वहीं कुछ ऐसी भी घटनाएं हैं जो ये बताने के लिए काफी हैं कि उसके ये तमाम दावे हवाहवाई से ज्यादा कुछ भी नहीं है। अब वो समय गया कि जब लोग नेताओं की सुनते थे। आज की पीढ़ी पढ़ी लिखी है। उसको धरातल पर होने वाले काम दिखने चाहिए। इसके बाद आप जो कुछ भी कहिएगा वो जरूर सुनेगी, मगर पहले काम करके दिखाइए।
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