आंकड़ों का सरकारी तमाशा

कटाक्ष

निखट्टू
एक गणितज्ञ एक बार अपनी पत्नी और बच्चे के साथ बारिश में उफनती नदी के किनारे पहुंचे। उनको उस पार जाना था। अब गणितज्ञ ने नदी में कुछ दूर तक एक आदमी को देखा और दूसरे किनारे खुद नदी में कुछ दूर तक गए। इसके बाद उन्होंने सारे पानी का औसत निकाला। कमाल हो गया। पूरी नदी में औसतन घुटने तक ही पानी है। बस फिर क्या था उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को ललकारते हुए कहा-चिंता की कोई बात नहीं है नदी में पानी सिर्फ मेरे घुटने तक ही है इसलिए डरने की कोई बात नहीं है चलो। पत्नी बेचारी डरी सहमी बच्चे की बांह थामें जैसे ही आगे बढ़ी। किनारे ही काफी गहराई थी वहीं जाकर फंस गई और बच्चे समेत बह गई। ये देखकर गणितज्ञ ने कहा अरे... जब पानी रहे थाहे तो बच्चा डूबे काहें? अर्थात अगर पानी कम था तो बच्चा कैसे डूब गया?  कुल मिलाकर प्रदेश की सियासत में भी सारा खेल इसी तरह का चल रहा है। यहां आंकड़ों में सब कुछ पास हो जाता है। तो फिर किसी को परवाह करने की भला क्या जरूरत? अब जिस महावर फर्मा की सिप्रोसिन में जिंक फास्फेट नामक चूहा मार दवा पाए जाने की बात विशेषज्ञों ने मीडिया को बताई थी, जांच में उनको बरी कर दिया गया। नारायणपुर में जिस अमृत दूध को पीकर दो आदिवासी बच्चों की मौत हुई थी। उस दूध को भी पोषक तत्वों से युक्त बता दिया गया। उधर जिनको मरना था वो मर गए। चिल्लाने वाले अपने-अपने घर  गए। जिनके खातों में लक्ष्मी को जाना था उनमें नोटों के बंडल भर गए। प्रदेश की फर्मास्यूटिकल मामलों की प्रयोगशाला के उस ईमानदार और बेहद नेक अधिकारी को हिंदी शब्दकोष से सारे गंदे शब्दों को शराफत से समर्पित करना चाहता हूं कि जिसने इतनी बड़ी ईमानदारी दिखाई। लाश में से भी पैसे तलाश लिए। अब इससे पहले कि कोई जांच कर हमको भी पागल करार दे दे और सरकार ये मान ले कि हां सही में ये पागल हैं चलो निकल लेते हैं घर की जानिब.... तो फिर कल आपसे फिर मुलाकात होगी तब तक के लिए जय...जय।

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