सरकार बताए 25 रुपए में चारा कहां से लाएं




 कौन सुनेगा गरियाबंद के गायों की गुहार






-गायों को चारा पानी मुहैय्या करने का दावा करने वाली सुराज की सरकार के अधिकारी एक गाय को चारे के लिए महज 25 रुपए देते हैं। आलम ये है कि इतने पैसे में तो इंसान को एक प्लेट ढंग का नाश्ता भी नहीं मिलता? तो भला गायों का पेट कैसे भरेगा? वह भी महज 2 सौ गायों के लिए उससे ज्यादा होने पर ये भी पैसे बंद। यही कारण है कि गरियाबंद जिले की अधिकांश गौशाला समितियां कर्जे में डूबती जा रही हैं। इधर महानदी भवन में सरकार अपने विकास का राग गा रही है। तो उधर गरियाबंद सहित प्रदेश की तमाम गौशालाओं में भूख से गायें रंभा रही हैं। ऐसे में सीधा सा सवाल कि गरियाबंद की गायों की गुहार कौन सुनेगा?

 गरियाबंद।
क्या है मामले की असलियत-
 प्रदेश में गौशालाओं की हालत अच्छी नहीं है।  अकेले गरियाबंद जिले की बात की जाए तो जिले में कुल 9 गौशालाएं संचालित हैं।
इनमें से दो गौशालाओं की हालत ठीक हैं जो संतों द्वारा संचालित की जा रही हैं।  इनको छोड़ दिया जाए तो बाकि 7 की हालत ठीक नहीं हैं।  सभी गौशालाएं शासनतंत्र की गलत नीतियों के कारण आर्थिक तंगी से जुझ रही हैं।
हालात इतनी खराब है कि कुछ गौशाला समीतियां कर्ज में डूब गई हैं, तो कुछ बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रही हैं।
सरकार और गौसेवा आयोग गौशालाओं के विकास के नाम पर भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहे हों मगर जमीनी हकीकत कोसों दूर है।
कितने पैसे देती है सरकार-
गौशाला संचालकों के मुताबिक शासन द्वारा एक गाय के पशु आहार के लिए 25 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से राशि मुहैया कराई जाती है।  शासन साल में चार बार ये राशि मुहैया कराता है।  मगर यह राशि भी कभी मिलती है तो कभी लैप्स हो जाती है।
इसके अलावा यह राशि अधिकतम 200 पशुओं की संख्या तक ही उपलब्ध कराई जाती है, यदि किसी गौशाला में पशुओं की संख्या इससे अधिक है तो उनके पशु आहार का भुगतान शासन द्वारा नहीं किया जाता है, यहीं कारण है कि समितियां चाहकर भी गौशालाओं में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पा रही है।

बॉक्स-
250 गायों के भूख से मरने के बावजूद भी नहीं जागी सरकार

कांकेर के कर्रामाड़ की कामधेनु गौशाला में 250 गायें भूख से तड़प-तड़प कर मर गईं। इसको लेकर पशु पालन विभाग ने थोक में घोषणाएं करके फिर चुप्पी साध ली। इतनी बड़ी घटना के बाद भी केंद्र सरकार की नीद नहीं टूटी। सरकार ने सीधे गौशाला को ही बंद कर दिया। वहां की गायों को दूसरी गौशालाओं में शिफ्ट कर दिया गया। ऐसे में सीधा सा सवाल तो यही है कि क्या सरकार गायों को लेकर गंभीर नहीं है? अगर गंभीर नहीं होती तो गायों की ये हालत नहीं होती और न ही समितियों पर इतना कर्जा लदता।

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