मन न रंगाए ...रंगाए जोगी कपड़ा

खटर-पटर-

निखट्टू-
हमारे मोहल्ले में एक  जोगी बाबा आते हैं। वे सारंगी की तान पर अलसुबह एक भजन गाते हुए फेरी लगाते हैं कि मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा। उनकी आवाज की $कशिश और सारंगी के सुर के साथ भजन की मिठास कई गुना बढ़ जाती है। कबीरदास की कठोर वाणी में कड़वा सत्य बयान करने की कूबत तो अब कवियों और साधु-संतों में ही बची है। मीडिया तो सत्ता की दरबारी गायक बन चुकी है। तो वहीं शासन-प्रशासन भी अपनों को उपकृत करने के चक्कर में गैरों को कब सज़ा दे बैठे कुछ कहा नहीं जा सकता। देश के हालात इन दिनों बिगड़ते जा रहे हैं। पहले एक आदेश आता था तो सामने वाला हिल जाता था। अब आलम ये है कि आदेश पर आदेश आते रहें कुछ भी नहीं होने वाला। यहां हर आदेश को एक कारण बताकर या तो अटका दिया जाता है। या फिर कहीं लिखकर लटका दिया जाता है। इसका खटका अब पहले जैसा लोगों को नहीं रहता है। सत्ता के जिम्मेदारों ने अपनी खुशियों के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुवादित कानून में संशोधनों की इतनी खिड़कियां खोलीं कि अब वहां सिर्फ और सिर्फ खिड़कियां ही दिखाई दे रही हैं। ऐसे में अब इनकी सुरक्षा पर ही सवालिया निशान लगने लगे हैं। इनको अब इन्हीं का बनाया कानून चलाने लग गया है। यानि पहले ये लोग कानून को चलाते थे। अब इन्हीं का बनाया कानून इनको चला रहा है। इनकी हिम्मत नहीं कि चूं भी कर सकें। इसके पीछे का कारण भी स्पष्ट है कि यहां जिम्मेदारी संभालने वालों ने कायदे-कानून के साथ सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ किया। उसका ईमानदारी से पालन नहीं किया गया,अगर उसका ईमानदारी से पालन किया गया होता तो देश आज कहां पहुंच गया होता, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरने के बाद किसी ने भी नहीं कहा था कि अब जापान सुधर भी पाएगा, मगर जापानियों के जीवट की दाद देनी होगी, जिन्होंने अपने देश को न सिर्फ पहले से ज्यादा समृध्द बनाया बल्कि आज उनकी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत कोई नहीं करता। इसको कहते हैं कानून का पालन करना। अपने ही देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री उनका बेटा किसी गैर सरकारी कंपनी में एक नौकरी के लिए आवेदन देने जा रहा था। प्रधानमंत्री ने अपनी पत्नी से कहलवाया कि लाइन में लग कर अनुशासन पूर्वक जाना। विनम्रता से बात करना, जो वहां का अधिकारी कहे उसका पूर्णरूपेण परिपालन करना। उनके बेटे ने वैसा ही किया। जब उसका आवेदन देखा गया  कि पिता का नाम तो लाल बहादुर शास्त्री है तो वहां के जनरल मैनेजर तक निकल कर बाहर आ गए। इस बच्चे को समझाने लगे कि आपको कतार में लगकर आने की क्या जरूरत थी? उसने हंसते हुए कहा कि ये बाबूजी का स्पष्ट निर्देश है, कि आपलोगों को मेरी ओर से किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए। आपलोगों को ही क्यों किसी को भी नहीं होनी चाहिए। ये वो लोग थे जिन पर आज भी देश का हर जिम्मेदार नागरिक नाज़ करता है। तो वहीं हमारे छत्तीसगढ़ में पूर्व विधायक के बेटे ने अपने चंद चमचों के साथ मिलकर एक गरीब के बेटे की महज इस लिए पिटाई कर दी, क्योंकि वो उनको संकरी सड़क पर पास नहीं दे रहा था। अब कायदा कानून किसके अंतस में बसा है ये तो आप आसानी से समझ गए होंगे न सर.... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय...जय।
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