बदहाल होती शिक्षा




सरकार और उसका शिक्षा विभाग चाहे लाख दावे कर ले मगर प्रदेश में शिक्षा के हालात बिल्कुल भी अच्छे नहीं हैं। ये बात हम नहीं वो आंकड़े बता रहे हैं, जो समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कहीं मास्टर साहब शराब के नशे में धुत्त होकर स्कूल पहुंचते हैं। तो कहीं गुरुजी बच्चों से शरीर की मालिश करवाते हैं। तो कहीं आश्रम अधीक्षिका ही गरीब आदिवासियों की बच्चियों का सौदा करती है। लोग पकड़ में भी आते हैं और पैसे  देकर छूट भी जाते हैं। शिक्षा की बदहाली की इससे भयावह तस्वीर और क्या होगी कि खुद प्रदेश के शिक्षा मंत्री की पत्नी की परीक्षा उनकी साली दे रही थी और पकड़ी गई तो फरार हो गई। उसको आज तक प्रदेश की पुलिस नहीं ढ़ूंढ पाई। तो वहीं अब बिलासपुर में पैसे लेकर सेकेंडरी के बच्चों को पास करने का मामला भी सामने आया है। कुछ दिनों पहले की ही तो  बात है कि प्रदेश के डीजी के सामने ही एक स्कूल के छठवीं के बच्चे संध्या और अध्यापक टेलीविजन की स्पेलिंग तक नहीं लिख सके थे। महासमुंद में प्रदेश के मुखिया के सामने बच्चा पांच का पहाड़ा तक नहीं पढ़ सका था। ऐसे में सवाल तो यही है कि क्या ऐसे ही परफॉर्मेंस वाले अध्यापकों को सातवां वेतनमान दिया जाना चाहिए? और तो और अब तो राजधानी का नगर निगम दैनिक वेतनभोगी शिक्षकों की भर्ती करने की योजना बना रहा है। यानि शिक्षक कहां से कहां जाते दिखाई दे रहे हैं। सरकार के  ऐसे सारे प्रयोगों का असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। इसके कारण उनका भविष्य चौपट हो रहा है। तो वहीं शिक्षा के अधिकार की भी सरेआम अवमानना हो रही है।
सरकार अगर वास्तव में शिक्षा को लेकर गंभीर है तो उसको सबसे पहले बच्चों की शिक्षा के आधार पर ही शिक्षकों का वेतनमान तय कर दे। जितना अच्छा रिजल्ट आएगा उसी के आधार पर शिक्षकों का वेतन बनेगा। ठीक यही प्रणाली हर विभाग में लागू कर दी जानी चाहिए। इससे न सिर्फ शिक्षा बल्कि दूसरे विभागों की कार्य प्रणाली में सुधार आएगा।
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