आंकड़ों का झूठ





भारतीय रिजर्व बैंक छत्तीसगढ़ को देश का सबसे गरीब राज्य बताती है। बैंक के मुताबिक यहां 39.93 फीसदी लोग गरीब हैं। तो वहीं सरकारी अधिकारियों का कहना है कि मैनपाट के असगांव में कोई गरीब नहीं है। ऐसे में गंभीर सवाल तो यही है कि आखिर झूठ कौन बोल रहा है? ऐसे झूठ के भरोसे आखिर कब तक चलेगी ये सरकार? कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो अब सरकारी आंकड़ों पर विश्वास करना भी बेवकूफी लगता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि इनका सच से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं दिखाई देता है। सीधी भाषा में अगर कहा जाए तो सातवां वेतनमान लेने वाले ज्यादा पढ़े लिखे अधिकारियों ने आंकड़ों को मजाक बनाकर रख दिया है। इसका खामियाज़ा गरीब और पिछड़े तबके के लोगों को भोगना पड़ रहा है। मजेदार बात तो ये है कि जब भी ऐसा होता है हमेशा जनता के साथ ही होता है। हमने आज तक ये नहीं सुना कि किसी अधिकारी ने गलती से किसी सरकारी मुलाजि़म को पहला वेतनमान दे दिया हो? उसके बाद ये मामला सामने आया हो कि उसको तो सातवां वेतनमान मिलना चाहिए था? किसी सांसद और मंत्री को 3 रुपए का चेक थमा दिया गया हो? प्रधानमंत्री का वेतनभत्ता 1 रुपए 35 पैसे बना दिया गया हो? आखिर ऐसी गलतियां वहां क्यों नहीं होती?
ये सब इसलिए होता है कि जनता को कोई अधिकार नहीं है कि वो उस लापरवाह अधिकारी का कॉलर पकड़कर हिसाब मांग सके। या फिर ऐसी लापरवाही करने वालों की नौकरी वापस ले सके। ऐसे में जिसके रूठने से भय न हो और खुश होने पर धन का लाभ न हो। न वो दान करता हो और न किसी पर कृपा तो शास्त्र कहता है कि उसके नाराज होने से भला क्या होगा?यही हाल इस देश में जनता का है। संभवत: ऐसी जानी समझी साजिशों का यही सार्वभौम सच भी है। इसलिए अगर सरकार को चाहिए कि अगर वो पारदर्शी प्रशासन का वादा पूरा करना चाहती है, तो सबसे पहले ऐसे लापरवाह अफसरों की नकेल कसे। इसके बाद इसको गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाए। इसके लिए सख्त से सख्त सजा का भी प्रावधान हो ताकि कोई भी सरकारी अधिकारी देश के गरीबों और पिछड़े तबके का मजाक न उड़ा सके।
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