हांफता सूचना का अधिकार




सूचना के अधिकारों की प्रदेश में किस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इसके तमाम मामले समय-समय पर आते ही रहते हैं। सरकारी अधिकारी जिस जानकारी को आम जनता को नहीं देना चाहते हैं उसको छिपाने के लिए मोटी रकम जमा करने का पत्र आवेदक को भेज देते हैं। अब गरीब आवेदक इस रकम को देखकर इतना सहम जाता है कि वो इससे तौबा कर लेता है। अधिकारियों की जान बच जाया करती है। संभवत: धमतरी जिले के श्रम विभाग के अधिकारियों ने भी कुछ ऐसा ही सोचा रहा होगा। उनको ये भी पता नहीं रहा होगा कि वे 25 हजार रुपए जो इस मध्यम वर्गीय व्यक्ति से जमा करवा रहे हैं वो इनको भविष्य में इतना भारी पडऩे वाला है। ऐसे में पहले तो उन्होंने सवा लाख रुपए जमा करवाने का पत्र दिया। जब वो आदमी पीछे नहीं हटा तो अधिकारियों ने कहा कि हमलोगों ने आंकलन ही गलत किया था। आप 32 हजार कुछ रुपए दे दीजिए। उसके बाद फिर तीसरे अधिकारी ने आवेदक से 25 हजार जमा तो करवा लिए मगर आज तक उसको उसके आवेदनों में वर्णित जानकारी नहीं दी जा रही है। ऐसे में अब वो आवेदक उपभोक्ता फोरम में जाने का मन बना चुका है।
ये तो महज एक नमूना है बताने भर को। प्रदेश के तमाम विभागों में लोग बड़ी तादाद में ऐसे आवेदन लगाते हैं और उनसे पैसे लेने के बावजूद भी उनको जनकारियां उपलब्ध ही नहीं कराई जाती हैं। आए दिन उनसे दफ्तरों के चक्कर कटवाए जाते हैं। ऐसे में सीधी सी बात तो यही है कि अगर चक्कर लगवाना था तो पैसे जमा ही क्यों कराए? पैसे जमा करवाने के बाद तो आवेदक को उसकी मांगी गई जानकारी देने में हील-हवाली करना भी कानून के दायरे में आता है। इसके लिए तमाम जिलों में फोरम बनाए गए हैं। तो वहीं राज्य के लिए अलग से फोरम बनाया गया है। उसके बाद आखिरी होता है केंद्रीय फोरम जहां से आवेदक न्याय की आस कर सकता है। अधिकारियों को चाहिए कि ऐसी जानकारी तत्काल आवेदक को उपलब्ध कराई जाए ताकि लोगों के साथ -साथ सरकारी अधिकारियों को भी परेशानी न हो।

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