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मैनपाट के मरीजों की बांस पर टिकी आस





सरगुजा। जिस राज्य का मुखिया खुद डॉक्टर हो वहां की ये शर्मनाक व्यवस्था देखकर शर्म से सिर झुक जाएगा। यहां न एंबुलेंस न दवाएं, और न ही इनकी खबर लेने वाला कोई सलीके का डॉक्टर। उफनते नदी नालों को पार करने के लिए बांस पर मरीजों को ढोते हैं। उस पर भी तुर्रा ये कि यहां डॉक्टर से हाथापाई गैरजमानती अपराध की श्रेणी में आता है। भले ही उस डॉक्टर की लापरवाही से तमाम लोगों की जान चली जाए। सरकार उसको कुछ भी नहीं बोलने वाली। ये घटना है मैनपाट की जो एक प्रकार से मरघट बन चुका है । यहां डायरिया से अब तक 23 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और 350 से ज्यादा मरीज सामने आए हैं।
अब तक मिले 3 सौ मरीज ,यहां के लोगों ने नहीं देखी संजीवनी और महतारी एक्सप्रेस
कहां-कहां है डायरिया का प्रकोप-
सुपलगा, नर्मदापुर, पैगा, सप्रादर, कर्महा, बंदना, बरीमा, असगांव जैसे तमाम गांवों में डायरिया फैला हुआ है। क्षेत्र के लोगों ने बताया कि यहां अभी भी 350 से ज्यादा नए मरीज के सामने आए हंै। इनकी सुनने वाला कोई नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अपने लोगोंं के वहां पहुंचने के दावे कर रहे हैं।
पानी में पाई गई खराबी-
जांच में यहां के पानी में भी खराबी पाई गई है। हर गांवों में कई हैंडपंप हैं। लोग इन्हीं का पानी पीते हैं। ऐसे में लोगों का कहना है कि इसके पीछे प्रदूषित पानी ही मुख्य कारण बताया जा रहा है।
हंडिय़ा छोडऩे को तैयार नहीं हैं मांझी-
इन गांवों में निवास करने वाली मांझी जनजाति के लोगों की आदत है चावल की बनी शराब पीने की। इसको यहां की चलती भाषा में हंडिय़ा कहा जाता है।
कम होती जा रही रोग प्रतिरोधक क्षमता-
डॉक्टर्स का ये मानना है कि एक तो ये लोग वैसे ही कमजोर होते हैं। ऐसे में यदि हंडिय़ा का प्रयोग करेंगे तो इनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इससे प्रभावित होती है। लिहाजा इनको इससे बचाना होगा। यदि इसको नहीं रोका गया तो इनकी जनसंख्या प्रभावित हो सकती है।
डायरिया से मरने वाले अधिकांश लोग मांझी-
डायरिया से मरने वाले लोगों में 99 फीसदी लोग मांझी परिवारों के बताए जाते हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि अगर इसी रफ्तार से इनकी मौतें होती रही तो वो दिन दूर नहीं जब इस पूरी जनजाति पर ही संकट खड़ा हो जाएगा।
राजधानी के लोग भी बेहाल-
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में भी बड़ी तादाद में डायरिया के मरीज भर्ती हैं। यहां भी उनको दवाओं की बाहर से शेेष पृष्ठ 5 पर...
खरीदी करनी पड़ रही है। ऐसे में सवाल तो यही है कि आखिर सरकारी बजट से आने वाली दवाएं कौन खा रहा है?
मेडिकल स्टोर्स से खरीदवा रहे दवाएं-
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल की हालत ये है कि यहां ज्यादातर दवाएं बाहर के मेडिकल स्टोर्स से खरीदवाई जा रही हैं। सरकार कितने ही ढाक-ढोल अपनी सफलता और विकास के नाम पर पीट ले, दिल्ली जाकर अपनी पार्टी के नेताओं को कितना भी बरगला ले मगर असलियत ये है कि विकास के नाम पर आज भी गांवों में सन्नाटा है। इनको देखकर लगता है कि लोग 18वीं शताब्दी में जी रहे हैं।
मोटा वेतन और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं-
प्रदेश के डॉक्टर्स जमकर चांदी काट रहे हैं। पैसे सरकार से उठाते हैं और मरीज नर्सिंग होम्स में अथवा अपने व्यक्तिगत चैंबर में देखते हैं। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल के नामचीन डॉक्टर्स भी प्राइवेट प्रैक्टिश धड़ल्ले से कर रहे हैं और प्रशासन उनको कुछ भी नहींखरीदी करनी पड़ रही है। ऐसे में सवाल तो यही है कि आखिर सरकारी बजट से आने वाली दवाएं कौन खा रहा है?
मेडिकल स्टोर्स से खरीदवा रहे दवाएं-
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल की हालत ये है कि यहां ज्यादातर दवाएं बाहर के मेडिकल स्टोर्स से खरीदवाई जा रही हैं। सरकार कितने ही ढाक-ढोल अपनी सफलता और विकास के नाम पर पीट ले, दिल्ली जाकर अपनी पार्टी के नेताओं को कितना भी बरगला ले मगर असलियत ये है कि विकास के नाम पर आज भी गांवों में सन्नाटा है। इनको देखकर लगता है कि लोग 18वीं शताब्दी में जी रहे हैं।
मोटा वेतन और जिम्मेदारी कुछ भी नहीं-
प्रदेश के डॉक्टर्स जमकर चांदी काट रहे हैं। पैसे सरकार से उठाते हैं और मरीज नर्सिंग होम्स में अथवा अपने व्यक्तिगत चैंबर में देखते हैं। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल के नामचीन डॉक्टर्स भी प्राइवेट प्रैक्टिश धड़ल्ले से कर रहे हैं और प्रशासन उनको कुछ भी नहीं बोलता।

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