बस इनको तो ऐसे ही छोड़ दो साहब
बदन पर चीथड़े और उस पे भी नज़रें जमाने की, इलाही हद भी होती है किसी को आज़माने की।
बीजापुर के केतुलनार में सरकारी दूध पीने से दो आदिवासी बच्चियों की मौत हो गई। तो वहीं दो अन्य बच्चों की तबियत खराब बताई जा रही है। जांजगीर-चांपा में भी इसी तरह का दूध पीने से 8 बच्चों की तबियत बिगड़ चुकी है। दोनों ही मामलों में सरकार की लापरवाही साफ-साफ दिखाई दे रही है। ऐसे में बाल संरक्षण का दावा करने वाले लोग और संस्थाएं आज बाल संरक्षण दिवस मनाने की तैयारी में लगी हैं। तो वहीं सरकार ने बड़ी तेजी दिखाते हुए दोनों मृत बच्चों के परिजनों को दस-दस हजार रुपए की गड्डियां थमा दीं। सवाल तो यही उठता है कि क्या एक गरीब आदिवासी के बच्चे की कीमत महज दस हजार रुपए है? घटना होने के बाद ही आखिर सरकार और सरकारी अधिकारियों की तंद्रा क्यों टूटती है? क्या सातवें वेतनमान के बाद भी इनका पेट नहीं भर रहा है? अगर सरकार ने वेतन बढाया तो इनका दायित्व क्यों नहीं बढ़ाया जाता? क्या बिना काम किए ही पूरा वेतन देने वाली नौकरी बन गई हैं सरकारी नौकरियां? बाल संरक्षण के नाम पर बनी वे कई दर्जन संस्थाएं तो सरकारी फंड का अंधाधुंध दोहन कर रही हैं, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? आखिर कहां भूमिगत हो गए इनके तथाकथित मसीहा? क्यों नहीं आते सामने? क्या यही दूध अगर किसी प्राइवेट कंपनी का होता तब भी सरकार का यही रवैया रहता क्या? क्या उसकी भी जांच इसी रफ्तार से चलती?
बार-बार ऐसी लापरवाही क्यों हो रही है। कभी बच्चों के खाने में छिपकली, तो कभी तिलचट्टे और सांप तक निकले हैं। इसके बावजूद भी सरकार अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रही है।
इसके बाद भी अधिकारियों और कर्मचारियों ने नहीं चेतने की कसम खा रखी है।
सबसे पहले जिम्मेदार और अधिकारियों को अपने नैतिक कर्तव्यों के प्रति हमेशा समर्पित रहना चाहिए। जिनती शिद्दत से सांसदों और मंत्रियों से लेकर अधिकारियों के वेतन बढ़ाए गए हैं उतनी ही उन अधिकारियों की जिम्मेदारी बढ़ाई जानी चाहिए। ऐसे मामलों को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्राथमिकता के आधार पर देखना चाहिए, लेकिन यहां तो सारा कुछ उल्टा दिखाई दे रहा है। इसके बाद तो यही कहना पड़ेगा कि सातवां वेतनमान लेने वालों का ये काम, अब तो बस रहने दो साहब... इनको इनके हाल पर छोड़ दो बड़ी कृपा होगी।
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