सियासत की सेहत
आखिर न दवाएं काम आईं न दुआएं सोमवार की रात को वो मनहूस खबर आ ही गई, जिसका डर तमिलनाडु की 7.78 करोड़ जनता को था। जैसे ही ये खबर आई अपोलो अस्पताल के प्रांगण से लेकर पूरे प्रदेश में कोहराम मच गया। तमाम महिलाएं पछाड़ें खाकर गिरीं और बेहोश हो गईं। चारों ओर लोग बेशाख़्ता चीखने लगे। लगा अम्मा ने उनको अनाथ कर दिया।
इसे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता की लोकप्रियता का ही सबूत माना जाना चाहिए कि 22 सितंबर को उनके अस्पताल में भर्ती होने के बाद से ही उनकी निजी समस्या उनके प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या बन गई थी। तमिलनाडु ही नहीं पूरे देश में उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जाती रही। इस बीच आए नोटबंदी जैसे पूरे देश को झकझोर देने वाले फैसले के बावजूद देश की निगाहें चेन्नई के अपोलो अस्पताल से आने वाली खबरों से हटी नहीं।
सोमवार को जब अचानक एक अफवाह आई कि पार्टी के कार्यालय का झंडा आधा झुका दिया गया है। तो उस वक्त भी वहां का माहौल काफी गर्म हो गया था। उसके बाद भीड़ ने अपोलो में घुसने की कोशिश भी की थी। पुलिस ने काफी मशक्कत के बाद हालात पर काबू पाया। इसके लिए उसको लाठी चार्ज तक करना पड़ा। लेकिन इसकी जो राजनीतिक प्रतिक्रिया दिखाई दी, वह कुछ अतिवादी थी। ऐसे मौके पर अस्पताल में कैबिनेट की बैठक करने जैसे फैसले को भी आपत्तिजनक कहा जा सकता है। सोशल मीडिया के जमाने में इस तरह के कदम कई तरह के भ्रम पैदा कर सकते हैं। कुछ अति अमेरिकी सरकार ने भारत आए अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह देकर भी कर दी। ये ऐसी चीजें हैं, जिनसे बचा जा सकता था।
दिनभर स्वास्थ्य को लेकर चली कयासबाजी और शाम को एक बार निधन की खबर आने के बाद आखिरकार देर रात जयललिता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनकी बीमारी ने कुछ सवाल उठाए हैं, जिन पर विचार काफी जरूरी है। जयललिता के पास सरकार की ही नहीं, पार्टी की भी पूरी बागडोर थी। हम नहीं जानते कि उनकी सरकार या पार्टी में नंबर दो पर कौन है? सरकार की बागडोर तो फिलहाल दो बार मुख्यमंत्री रह चुके पन्नीरसेल्वम को सौंप दी गई है। लेकिन जयललिता के बाद अब पार्टी को कौन और किस तरह चलाएगा, यह कोई नहीं जानता।
इसका नतीजा हम नोटबंदी के बाद की स्थितियों में देख सकते हैं। अन्नाद्रमुक देश के अकेली ऐसी बड़ी पार्टी है, जिसने अभी तक नोटबंदी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। न उसे अच्छा बताया है, न बुरा। सरकार भले ही चल रही है और कैबिनेट के बैठकें भी हो रही हैं, लेकिन नोटबंदी के मामले में तमिलनाडु की सरकार भी पूरी तरह मौन है। यहां तक कि राज्य के वित्त मंत्री ने भी इस मामले में कुछ नहीं कहा। बेशक, हम इस सबका दोष जयललिता को नहीं दे सकते। पूरे देश में जिस तरह से लोकप्रियता की राजनीति चल रही है, उसमें यह हर तरफ हो रहा है।
नेता अपनी लोकप्रियता के कारण सीधे जनता से जुड़ जाता है, और फिर पार्टी संसदीय राजनीति को निभाने की औपचारिकता भर रह जाती है। यह हाल देश के कई दलों का है, जिनमें बस एक बड़ा नेता है और बाकी की अहर्ता इतनी ही है कि वे उस नेता की पसंद है। अपनी पसंद के लोगों को मंत्री बनाने या पार्टी पदों पर बिठाने से एक सुविधा यह रहती है कि इससे आप अपनी नीतियों को अच्छे ढंग से नीचे तक लागू कर सकते हैं, पर इसके साथ ही जरूरी है कि पार्टियों और सरकारों में एक स्पष्ट वरिष्ठता क्रम हो, ताकि संकट के समय कोई दुविधा न रहे। उम्मीद है कि जयललिता के बाद अब तमिलनाडु से भारतीय राजनीति में एक नई परंपरा शुरू हो सकेगी।
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