ऐब की बजाय जेब पर नज़र
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कोहरे से रेंगती रेल को गति देने में नाकाम रहे रेलमंत्री ने रेल यात्रियों के भाड़े को रफ्तार देने का मन बना लिया है। उन्होंने पहले से टिकटों पर लिखी 43 प्रतिशत की सब्सिडी को खत्म करने का प्रयास शुरू कर दिया है। यानि अभी तक जिस टिकट को आप 57 रुपए में खरीदा करते थे उसके लिए आपको पूरे सौ रुपए देने होंगे। भगवान भरोसे चलने वाली भारतीय रेलों के लिहाज से ये रकम काफी ज्यादा है। सरकार हर मामले में विदेशों की नकल करती जा रही है। कभी बुलेट तो कभी टैल्गो जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों का सपना दिखाकर अब ये सरकार अपना उल्लू सीधा करने में लगी है। आलम ये है कि सुविधाओं और अपनी जिम्मेदारियों के बढ़ाने की बजाय सारा भार जनता की जेब पर डालने जा रही है। ये पूरा देश जानता है कि ज्यादातर भारतीय ट्रेनें समय पर नहीं चलती हैं। इनमें यात्रियों की सुरक्षा के लिए दिखावे की व्यवस्था है। विभाग में सुरक्षा बलों और टीटीई के तमाम पद खाली पड़े हैं। इसके बाद भी जनता को ये बताया जा रहा है कि रेलवे घाटे में चल रही है। इसके पीछे रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों की नाकामी है। अब रेल मंत्री बजाय उसको सुधारने के आम जनता की जेब तराशने पर आमादा हैं। इसी रेलवे को देश के एक रेलमंत्री ने बीस हजार करोड़ का मुनाफा कमवाया था। उनको लोग मैनेजमेंट गुरू भी कहने लगे थे। विदेशों के तमाम विश्वविद्यालयों ने उनको लेक्चर देने के लिए बुलाया था। और एक ये रेलमंत्री हैं कि अब अपना ऐब छिपाने के लिए जनता की जेब काटने जा रहे हैं। सवाल तो ये भी उठने लगा है कि क्या भारतीय रेल अब निजीकरण की ओर बढ़ रही हैं? अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी चीज का अगर निजीकरण करना होता है तो उसको पहले घाटे का सौदा बता कर जनता को गुमराह किया जाता है। उसके बाद उसको चुपचाप किसी बड़े उद्योगपति घराने को सौंप दिया जाता है। ऐसे में अचानक रेलवे को इतना बड़ा घाटा दिखाने के पीछे कहीं सरकार की ये मंशा तो नहीं है?
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