दो$गली नीतियों के शिकार आदिवासी


चांदी के घरौंदों की जब बात चली होगी, मिट्टी के खिलौनों से बहलाए गए होंगे।


वन बैगा और बघवा की भूमि छत्तीसगढ़ को माना जाता रहा है, मगर अब उसकी असलियत ये है कि वन कट रहे हैं, बैगा घट रहे हैं और बाघों का शिकार हो रहा है। तो वन विभाग इस पर पर्दा डालने में लगा है। दूसरी ओर सरकार के लिए बड़े लाभ के साबित हो रहे हैं ये आदिवासी। पिछड़ा राज्य होने की दिल्ली में गुहार करके प्रदेश के सुखिया मुखिया जमकर पैसे मांगते हैं और उनका उपयोग कर खास के लिए नया रायपुर जैसा शहर बसा रहे हैं। आदिवासियों के कल्याण के लिए आई योजनाओं का क्या हाल है ये किसी से भी छिपा नहीं है। गरीबों और आदिवासियों के हिस्से का चावल शहर में बैठा कोई गाड़ी और बंगले वाला डकार रहा है। सुविधाओं के नाम पर वहां आज भी सन्नाटा है। तो महज कुछ लोगों की शह पर साल में एक दिन अंतरराष्ट्रीय  आदिवासी दिवस के दिन इनको सुदूर अंचलों से शहर लाया जाता है। जहां ये अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए यहां की सड़कों पर जाना तो चाहते हैं मगर प्रशासन उनको वहां भी जाने से रोकने के पुख्ता इंतजाम किए बैठा है। ऐसे में इनका विरोध बस महज औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। जब आदिवासियों का सैलाब राजधानी में घुस रहा था तो प्रदेश के मुखिया शहर से दूर पुरखौती मुक्तांगन की ओर कूच कर गए थे। तो दूसरे नेता जो खुद को आदिवासियों का अगुवा बताते नहीं थकते वे भी किनारे खिसक लिए थे। तो कुछ को भाजपा ने जबरिया कार्यक्रम से दूरी बनाने की नसीहत दे रखी थी, लिहाजा वे नहीं आए। ऐसे में व्यवस्था से छले गए आदिवासियों को अब उनका ह$क कौन दिलाएगा ये सवाल फिर साल भर के लिए हवा में लटक गया। बेचारे आदिवासियों का आंदोलन लगा कि शहरों में आकर भी रास्ता भटक गया। ऐसे में गरीबों की हिमायती होने का दम भरने वाली सरकार और उसके मुखिया की कार्यशैली पर सीधा सवालिया निशान लगता दिखाई दे रहा है। क्या आदिवासी इस राज्य और भारत के नागरिक नहीं हैं? अगर हैं तो उनके अधिकारों को लेकर सरकार इस तरह की दो$गली नीति क्यों अख़्ितयार करती है? उनका पैसा दीगर परियोजनाओं में क्यों लगाया जाता है? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज नहीं तो कल इस प्रशासन को देना ही होगा।

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