ज़हर का नाम दवा रक्खा है

कटाक्ष-

निखट्टू

एक शायर ने लिखा है कि - उसने यूं जुर्म रवां रक्खा है, ज़हर का नाम दवा रक्खा है। भाजपा शासित राज्यों को देखने के बाद तो ये बात बिल्कुल सही मालूम होती है। यहां कुछ लोग ज़हर खा ले रहे हैं। तो कुछ को मजबूरी में ज़हर खाना पड़ रहा है। इन दोनों से जो बच रहे हैं  उनको सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ज़हर खिला दे रहे हैं। कहीं दूध के नाम पर तो कहीं पोषाहार के नाम पर। ये देख-देखकर हमारा तो मन बुझता जा रहा है। किसी से भी बात करने का मन नहीं करता। तो वहीं देश में एक जन हैं वो कभी मन की बात करते हैं तो कभी रमन की। छत्तीसगढिय़ामन के गोठ करे में ओखर होंठ काबर बंद हो जाथे? यहां अमीरों के झोले में गरीबों का चाउर, कोई गहने तो कोई खेत गिरवी रखकर बना रहा है शौचालय, और श्रेय लेने दौड़े आते हैं प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री? बस्तरिया लोगों के दोनों ओर डर। मैदान में रहने वालों को बांटा जा रहा  ज़हर। पैसे वालों के लिए बसाया जा रहा खास शहर। आदिवासियों का वन अधिकार पट्टा से मन हो गया है खट्टा। मुख्यमंत्री भी भाषण देते हैं मार कर रट्टा। चौथे कार्यकाल पर लोग खड़ा कर रहे है सवाल। तो उधर भाजपाई अभी भी ठोंक रहे हैं ताल। नाकाम विधायक और लापरवाह अफसर बनते जा रहे हैं प्रशासन के लिए जंगम ज़हर। ऐसे में अगर नहीं पैदा की गई कोई बड़ी लहर तो मुख्यमंत्री के जीत का कारवां यहीं जाएगा ठहर.... समझ गए न सर... तो अब हम भी निकल लेते हैं घर...कल फिर आपसे मुलाकात होगी...तब तक के लिए जय....जय।
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