लोक की लाश पर तंत्र का तांडव
संपादकीय-
अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर बस्तर में प्रशासन ने हमारे जांबाज जवानों के शौर्य और अदम्य साहस की वीरगाथा पर कालिख पोत दी। उसने
वही कारनामा दोहराया जो अब से छह माह पहले हुआ था। दो आत्मसमर्पित नक्सली जोड़ों का विवाह समाज की आड़ लेकर करवाया गया। इसमें आईजी नक्सल ऑपरेशन और कलेक्टर भी मेहमान बने और तमाम जवानों और सरकारी अधिकारियों ने जमकर ठुमके लगाए। बस्तर का निरीह आदिवासी उसकी आड़ में चलने वाले खिलवाड़ को देखता रहा। जब ये अधिकारी बैंड की धुन पर नाच रहे थे तो उस वक्त एक बारगी लगा कि ये निरंकुश तंत्र- लोक की लाश पर तांडव कर रहा है। स्तब्ध रह गया ये सोचकर कि क्या इसी तंत्र की व्यवस्था लोक की सेवा के लिए की गई थी? जिन्होंने हमारे सुरक्षाबलों के जांबाज जवानों और अफसरों की हत्या की आज हमारे ही जवान और अधिकारी ऐसे गुनहगारों की मांग में हमारी ही बहन-बेटियों के हिस्से का सिंदूर इतनी धूमधाम से भरवा रहे हैं? चार दिन बाद पंद्रह अगस्त है जहां समारोह में शामिल होने वे विधवाएं भी आएंगी जिन्होंने अपना सुहाग बस्तर की शांति के लिए न्यौछावर कर दिया। समझ में नहीं आता कि ये अधिकारी उनको क्या जवाब देंगे? क्या कह कर प्रशासन उनको चुप कराएगा? कि जिन्होंने तुम्हारी मांग का सिंदूर उजाड़ा हमने सरकारी पैसों पर उनका सिंदूरदान करवाया? बारात में बैंड की तान का मजा लेते प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस के आला अफसरों को देखकर लगा कि बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा की लाश पर इस बार नक्सली नहीं बल्कि प्रशासन के लोग नाच रहे हैं और आदिवासी तमाशबीन बना सब कुछ देख रहा है।
सबसे अहम सवाल तो ये है कि नक्सलियों के प्लास्टिक के चप्पलों पर नाक रगडऩे वाले ये जयचंद किस हाथ से तिरंगे की रस्सी खींचेंगे? क्या इनकी आत्मा इनके इस कायरपन पर इनको नहीं धिक्कारेगी? झंडे के नीचे रखी अपने ही जांबाज शहीदों की तस्वीर से कैसे आंख मिलाएंगे? अगर वे जवान जिंदा होते तो क्या इनकी वो माला स्वीकार करते ? इनको उस जीप पर खड़े देखकर लगा कि जैसे किसी ताकतवर टाइगर ने किसी गीदड़ के आगे सिर टेक दिया हो। इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि जिन सुरक्षाबलों के बूटों की धमक से अपराधियों और नक्सलियों के आकाओं के दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं। इनकी आहट लगने मात्र से वे जंगलों में पनाह मांगते फिरते हों उनके सामने उसी सेना का नायक इस अंदाज में जाए तो फिर इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
देश की सर्वोच्च अदालत को ऐसे मामलों को संज्ञान में लेकर इन पर वैधानिक कार्रवाई करे, ताकि दोबारा कोई भी सरकारी अधिकारी हमारे कानून और जवानों के आदर्शों का इस कदर मजाक न उड़ा सके।
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