भलाई की सजा
गुनहगारों में शामिल हूं गुनाहों से नहीं वा$िकफ, सजा तो जानते हैं हम खुदा जाने $खता क्या है?
पहले गुजरात में गौसेवकों का दलितों पर तांडव, तो अब छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर ग्रामीणों का तु$गलकी फरमान उनकी जान का दुश्मन बना हुआ है। गुजरात में उन ग्रामीणों का दोष महज इतना था कि वे मरी हुई गायों के शव को हटाने के बाद उनकी खाल निकाल रहे थे। तो यहां हाथी का पोस्टमार्टम करना इन अधिवासियों को भारी पड़ गया। मरे हुए हाथी का पोस्टमार्टम करने पर वन विभाग ने इनको पंद्रह सौ की मजदूरी दी थी। तो वहीं समाज के ठेकेदारों ने गणेश भगवान का पोस्टमार्टम करने के जुर्म में इनके ऊपर पांच हजार रुपए का जुर्माना ठोक दिया। गुजरात के दलितों ने तो कलेक्टर को ज्ञापन देकर मरे जानवरों का शव उठाने और उसको ठिकाने लगाने से साफ मना कर दिया। हालांकि छत्तीसगढ़ के ये आदिवासी अब इस भय में फंसे हुए हैं कि अगर ये जुर्माना नहीं भर पाए तो इनको समाज से बाहर कर दिया जाएगा। समाज में और कोई कामकाज होता हो या नहीं,मगर ऐसे काम जरूर होते रहते हैं। इन्हीं समाज के ठेकेदारों के सामने गाय प्लास्टिक चबाती है जो इनकी पत्नी कूड़ेदान में फेंक कर गई होती है। जिस हाथी का पोस्टमार्टम उन दो आदिवासियों ने किया, वो जिस बिजली के तार में फंस कर मरा था उसको लगाने वाला कातिल भी इसी समाज का रहा होगा? ऐसे में उसको क्या सजा मिली? ये किसी ने नहीं देखा...अलबत्ता इन्होंने सफाई का प्रयास किया तो इन पर जुर्माना थोप दिया गया? छत्तीसगढ़ में तो आए दिन ही किसी न किसी को समाज से बाहर किया ही जाता रहता है। किसी का हुक्का-पानी बंद, तो किसी को समाज से बाहर कर दिया जाता है।
जब कि दोनों ही मामलों में पीडि़तों का कोई ऐसा दोष नहीं था कि उनको किसी भी प्रकार दंडित किया जाए। गंदगी की सफाई करना आखिर अपराध है क्या? तो वे दोनों ही दलित तो हमारे वातावरण में उस गाय अथवा हाथी के सड़े मांस की सड़ांध न फैले इसके लिए काम किया। कौन कहे उनको पुरस्कृत करने को उल्टे तिरस्कृत करना शुरू कर दिया। समाज और उसके तथाकथित ठेकेदारों को उनका ये काम कैसे उल्टा समझ में आया, ये सोचकर किसी का भी दिमाग खराब हो जाएगा।
अब समय आ गया है कि तमाम रूढि़वादियों में जकड़े ऐसे समाज में स्वस्थ मानसिकता वाली शिक्षित और भद्र युवा पीढी को शामिल किया जाए। उनको उनकी भूमिका को भी भलीभांति समझाया जाए। इसके बाद ही ऐसी घटनाओं पर लगाम कसेगी।
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