लूट तंत्र का बोलबाला


सनम की खिदमत में ये सभी जो रुके हुए हैं झुके हुए हैं, हुकुम पे तलवे भी चाट लें जो गुलाम ऐसे भी आ गए हैं।


छत्तीसगढ़ विकास की किस डगर पर जा रहा है? ये कांकेर में देखने को मिला। यहां पहली ही बरसात में नई बनी सड़क पूरी तरह चौपट हो गई। तो कहीं पुलिया का भी हुलिया खराब है। रपटा की ओर जब तेजी से बरसात का पानी झपटा तो वो कहां रफूचक्कर हो गया किसी को भी पता नहीं। अब खस्ताहाल सड़कों पर कलेक्टर डलवा रही हैं मुरुम और मिट्टी। जहां न बजरी बची है और न गिट्टी। गरीब जनता की गुम है सिट्टी-पिट्टी। सरकारी खजाने को लगाया जा रहा है चूना। जनता की खून पसीने की कमाई ऐसे जा रही है प्रदेश में उड़ाई। भ्रष्ट अफसरशाही और ठेकेदार प्रदेश के विकास का करते जा रहे हैं बंटाधार। मुख्यमंत्री नई दिल्ली से आदिवासियों के विकास के नाम पर केंद्र से मोटा बजट लाते हैं, और प्रदेश के अफसर और ठेकेदार उसको ऐसे उड़ाते हैं।  एक ही बारिश में खुल गई सुराज की सरकार के विकास की पोल, जिसका प्रदेश के सुखिया मुखिया पीटते आ रहे थे ढोल। काम से ज्यादा कमाई पर प्रदेश की अफसरशाही विश्वास करने लगी है। उसको कमाई चाहिए काम नहीं। तो वहीं ऐसे ही अधिकारियों को प्रदेश सरकार सातवां वेतनमान भी देने जा रही है। यानि गरीबों की कमाई को फिर से लुटाने का उपक्रम शुरू हो चुका है। ऐसे में सवाल तो ये भी उठता है कि जो अधिकारी सरकारी खजाने को ऐसे-ऐसे नुकसान पहुंचाते हैं उनको सातवां वेतनमान देना कहां तक उचित है?
तो जनता के पैसों की बरबादी रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? वो क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा रहा है?
सरकार अगर वास्तव में सरकारी पैसों की बंदरबांट को लेकर गंभीर है तो उसको सबसे पहले तो ऐसे गुणवत्ताहीन निर्माण करने वाले ठेकेदारों को तत्काल ब्लैकलिस्टेड करना चाहिए। इसके साथ ही साथ उन तमाम अफसरों के खिलाफ अमानत में ख्यानत करने का मामला और सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित तमाम अपराधिक धाराओं के तहत मामला पंजीबध्द किया जाना चाहिए, ताकि कोई दोबारा सरकारी खजाने को इस तरह से लूटने का दुस्साहस न दिखा सके।

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