56 इंच की छाती वाला दरवान
कटाक्ष-
निखट्टू-
एक शायर का एक शेर है कि- बहरों के इस शहर में कुछ बेअसर धमाके, कहिए सुमन जी किसको $गज़लें सुना रहे हैं। बिल्कुल बज़ा है हुज़ूर ने... देश की सियात का हाल कुछ इसी ओर इशारा कर रहा है। गांवों में एक कहावत है कि सावन के अंधे को दुनिया हरी ही दिखाई देती है। अब ये राजनेता भगवान जाने किस मौसम में अंधे हुए हैं कि इनको सिवाय वोट और नोट के कुछ नहीं दिखाई देता, अगर कोई इनको इससे रोकने और टोकने की गलती करता है तो उसको चोट देने से भी ये नहीं चूकते। पहले लोग सियासत को गूंगी-बहरी बताया करते थे। अब उसकी संगत में रहते-रहते नेता भी गूंगे और बहरे होते जा रहे हैं। इनको न तो किसी बलात्कार पीडि़ता की चीख सुनाई देती है और न ही उसकी सिसकती मां के आंसू दिखाई देते हैं। लोगों की कराह की तो बात ही छोड़ दीजिए। देश के सबसे ताकतवर इंसान को भी जवाब देने में महीनों लग जाते हैं। पहले बड़ी -बड़ी बातें करने वाले भी अब चुप रहना सीख गए हैं। नहीं समझे.... अरे वही अपने छप्पन इंच के सीने वाले दरवान जी.... जो आजकल कहे जाते हैं प्रधानमंत्री जी। पहले तो मंचों पर चढ़ते ही हांकने लग जाते थे लंबी-लंबी। अब पता नहीं कौन सा खर खा लिए कि बोलने का मन ही नहीं करता? आठ बार मीडिया के कुरेदने पर एक बार बोलते हैं। हमें तो महाकवि भूषण याद आते हैं... कि तीन बेर खाती थीं जो तीन बेर खाती हैं।
हमारी तो तीन तोले की खोपड़ी ये सोचकर भारी होती जा रही है कि कोई है जो मुझे ये भरोसा दे -दे कि देश में कानून व्यवस्था ठीक से अपना काम कर रही है? अगर नहीं तो फिर ऐसे निकम्मों को निकाल बाहर करने की बजाय ये बेवकूफों की सरकार उनको सातवां वेतनमान क्यों दे रही है?
आखिर कौन सा कानून ऐसा कहता है कि बिना काम के सारे सुख और सुविधाएं सरकारी अधिकारियों को दी जानी चाहिए, और क्यों?
भइया... हमको तो ये दरवान श्रीमान नहीं जमते.... आपको जमते हों तो अच्छी बात है। यहां तो लोग दिखा-दिखाकर कानून का डर जनता के पैसे रहे हैं बैंकों में भर....समझ गए न सर... तो फिर हम भी निकल लेते हैं अपने घर...कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय...जय।
निखट्टू-
एक शायर का एक शेर है कि- बहरों के इस शहर में कुछ बेअसर धमाके, कहिए सुमन जी किसको $गज़लें सुना रहे हैं। बिल्कुल बज़ा है हुज़ूर ने... देश की सियात का हाल कुछ इसी ओर इशारा कर रहा है। गांवों में एक कहावत है कि सावन के अंधे को दुनिया हरी ही दिखाई देती है। अब ये राजनेता भगवान जाने किस मौसम में अंधे हुए हैं कि इनको सिवाय वोट और नोट के कुछ नहीं दिखाई देता, अगर कोई इनको इससे रोकने और टोकने की गलती करता है तो उसको चोट देने से भी ये नहीं चूकते। पहले लोग सियासत को गूंगी-बहरी बताया करते थे। अब उसकी संगत में रहते-रहते नेता भी गूंगे और बहरे होते जा रहे हैं। इनको न तो किसी बलात्कार पीडि़ता की चीख सुनाई देती है और न ही उसकी सिसकती मां के आंसू दिखाई देते हैं। लोगों की कराह की तो बात ही छोड़ दीजिए। देश के सबसे ताकतवर इंसान को भी जवाब देने में महीनों लग जाते हैं। पहले बड़ी -बड़ी बातें करने वाले भी अब चुप रहना सीख गए हैं। नहीं समझे.... अरे वही अपने छप्पन इंच के सीने वाले दरवान जी.... जो आजकल कहे जाते हैं प्रधानमंत्री जी। पहले तो मंचों पर चढ़ते ही हांकने लग जाते थे लंबी-लंबी। अब पता नहीं कौन सा खर खा लिए कि बोलने का मन ही नहीं करता? आठ बार मीडिया के कुरेदने पर एक बार बोलते हैं। हमें तो महाकवि भूषण याद आते हैं... कि तीन बेर खाती थीं जो तीन बेर खाती हैं।
हमारी तो तीन तोले की खोपड़ी ये सोचकर भारी होती जा रही है कि कोई है जो मुझे ये भरोसा दे -दे कि देश में कानून व्यवस्था ठीक से अपना काम कर रही है? अगर नहीं तो फिर ऐसे निकम्मों को निकाल बाहर करने की बजाय ये बेवकूफों की सरकार उनको सातवां वेतनमान क्यों दे रही है?
आखिर कौन सा कानून ऐसा कहता है कि बिना काम के सारे सुख और सुविधाएं सरकारी अधिकारियों को दी जानी चाहिए, और क्यों?
भइया... हमको तो ये दरवान श्रीमान नहीं जमते.... आपको जमते हों तो अच्छी बात है। यहां तो लोग दिखा-दिखाकर कानून का डर जनता के पैसे रहे हैं बैंकों में भर....समझ गए न सर... तो फिर हम भी निकल लेते हैं अपने घर...कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय...जय।
Comments