अच्छे दिनों की तलाश
सुराज की सरकार ने अच्छे दिनों का वादा कर सरकार तो बना ली। जनता ने भी उसकी बात पर भरोसा करके अपने देश के लिए साठ महीनों के लिए एक चौकीदार रख लिया। अब क्या पता था कि चौकीदार सिर्फ अपने लोगों को ही खजाने का माल निकाल-निकाल कर पकड़ाता जाएगा। खुद तो सरकारी राजहंस पर चढ़कर करेगा पूरी दुनिया का टूर और देश के गरीब किसान और मजदूर वैसे ही होते रहेंगे मजबूर। बारिश में बहती सड़कें और पुल, बिना भवनों वाले स्कूल, अस्पतालों में नहीं है दवाई न भोजन और न ही बिस्तर। सातवां वेतनमान ले रहे हैं मजे से डॉक्टर। इनके तो अच्छे दिन आए जनता भले ही रोए या चिल्लाए?
इससे भी ज्यादा दुखद मामला तो बस्तर में देखने को मिला। यहां के कुदालगांव को करीब चौदह साल पहले निर्मल ग्राम के पुरस्कार से नवाजा गया था। ये पुरस्कार गांव को स्वच्छता के लिए दिया जाता है। ऐसे गांवों को ओडीएफ होना चाहिए। गांव की असलियत ये है कि अभी वहां के सौ फीसदी लोग खुले में शौच करने जाते हैं। यानि जिस गांव को निर्मल ग्राम पुरस्कार दिया गया था अब वहां शौचालय ही नहीं बचे हैं। तो वहीं गांव वालों को बिजली विभाग के अधिकारियों की मनमानी का भी शिकार होना पड़ रहा है। बिजली विभाग के अधिकारी यहां के गरीब लोगों को हर महीने एक से डेढ हजार का बिल थमा देते हैं। ऐसे में सवाल तो ये है कि दाने-दाने को मोहताज ये गरीब इतनी मोटी रकम भला कैसे भर पाएंगे? सरकार के सितम से तंग इन गरीबों ने अपनी पीड़ा आम आदमी के कार्यकर्ताओं को बताई। राज्य में पूरी तरह संवेदनहीन हो चुकी सरकार के प्रति लोगों में आक्रोश पनपता जा रहा है। यदि सरकारी अधिकारियों ने महानदी के वातानुकूलित कमरों से फील्ड में निकलने की आदत नहीं डाली। तो आने वाले चुनावों में जनता यहां के नेताओं को वही सबक सिखाएगी। जो देश की जनता ने कांग्रेस की सरकार को पिछले चुनावों में सिखाया था। इसमें कोई दो राय नहीं है।
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