धत्ता बताने वाली सत्ता

कटाक्ष

निखट्टू
संतों...... सियासत का नाम ही आजकल बुरा होता जा रहा है। पहले ये सेवा हुआ करती थी। लोग खुद कष्ट भोगकर दूसरों का दु:ख हरते थे। समाज में नेताओं का बड़ा ऊंचा स्थान था। लोग उनके आदर्शों की बात किया करते थे। समय के साथ -साथ सियासत भी बदल गई। लोक को धत्ता बताकर तंत्र उस पर चढ़ बैठा। उसी की कमाई खाकर उसी को लतियाने लगा। नेता जी ने भी जनता जनार्दन को धत्ता बताकर सिर्फ सत्ता हथियाने को ही अपना आखिरी हथियार मान लिया। ऐसे में जनता अंधे की लुगाई और गांव भर की भौजाई हो गई। हर किसी की एक ही ख्वाहिश है कि कैसे बिना काम किए मोटा वेतन भत्ता और तमाम सुविधाएं मिल जाएं। इसकी चाह में इन लोगों ने एक बड़ी अजीब सी राह निकाली। इसकी खासियत है कि झूठे आंकड़ों के घोड़े दौड़ाना। अब ये सरकार की मजबूरी है कि वो वही देखती है जो उसके अधिकारी दिखाते हैं।वो वही बोलती है जो उसको बताते हैं। वो वही करती है जो ये लोग कहते हैं। इससे पहले भी एक राष्ट्रीय पार्टी ने सबसे लंबे समय तक देश में सत्ता का सुख भोगा मगर देशहित के मामलों को दूध पिलाते रहे। तो वहीं अपने अंकल के आगे दुम भी हिलाते रहे। अंकल भी यारी के नाम पर गद्दारी ही करते रहे। जब तक अंकल को समझ में आती हमारे पड़ोसी की माया इनके भी दो बड़े मकानों का हो चुका था सफाया। उसके बाद इनको उसकी नजर नहीं आई गुस्ताखी। इनकी कृपा हमारे पड़ोसी पर जारी रही बिना फुलस्टॉप और कॉमा। अंत में इनको खेलना पड़ा हाईप्रोफाइल ड्रामा जिसमें मारा गया ओसामा। तो समझ गए न सर..... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर। कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।

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