रूस पालता है सूंस

कटाक्ष-

निखट्टू
हमारे देश में सूंस यानि डॉल्फिन को गंगा की गैया कहते हैं। इनको बनारस के घाटों के इर्दगिर्द यदाकदा देखा जा सकता था। तो आजकल इनकी तादाद लगातार घटती जा रही है। इसका कारण भी शिकार बताया जा रहा है। इन नदियों की गायों को पहले तो प्रदूषण ने अंधा कर दिया उसके बाद की बची कसर कुछ धनलोभी लोग निकाल रहे हैं। वे इसको मार कर उसकी चर्बी का व्यवसाय कर रहे हैं। तो वहीं हमारा पड़ोसी मित्र देश रूस संूस को पाल रहा है। उसके यहां इसकी एक विशेष प्रकार की फोर्स है। जो सीधे वहां के राष्ट्रपति के संपर्क में रहती है। ऐसा इस लिए क्योंकि ये समुद्र में बड़ी ही घातक अंदाज में दुनिया के खतरनाक से खतरनाक सबमैरीन्स को पलक झपकते ही मटियामेट करने में महारत रखती हैं। एक स्वस्थ सूंस इंसान की तुलना में नौ गुना ज्यादा दिमाग रखती है। रूस की इन सूंस से तो मार्कोस और अमेरिका के सील कमांडोज को भी पार पाना आसान नहीं है। पानी में ये अपने किसी भी टॉगेट को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद कर देती हैं। यानि रूस की मूंछ हैं ये सूंस तो हमारे देश वाले इनको नहीं रहे हैं पूछ।
वैसे भी इस गंगा की गैया को नदियों के स्वास्थ्य का पैमाना माना जाता है। इनकी संख्या वृध्दि से ही हम नदी के स्वास्थ्य का अंदाजा लगाते हैं। तो वहीं तेल के चक्कर में इनका शिकार किया जा रहा है। इन लोगों को ये भी नहीं समझ में आता कि यदि ऐसा ही रहा तो हम एक दिन इन सूंस का तेल निकालने के चक्कर में अपनी नदियों के स्वस्थ्य का तेल निकाल डालेंगे। ऐसे में सरकार को तत्काल इनके शिकार वाले खेल को फेल करना होगा। इससे नदियों  की सेहत भी बचेगी और सूंस भी। बटलनोज़ डॉल्फिंस की रूस में ज्यादा मांग है। वो भी महंगे दामों में तो देश की सरकार अगर चाहे तो डॉल्फिन बचाए पैसा कमाए की तर्ज पर इनकी आपूर्ति रूस को कर सकती है। तो समझ गए न सर.... अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।

Comments

Popular posts from this blog

पुनर्मूषको भव

कलियुगी कपूत का असली रंग

टूटी हड्डियां जोड़ने वाली लता