कुपोषण की मार झेल रहे आदिवासियों के परिवार



राज्य में बड़ी तादाद में आदिवासियों के बच्चे कुपोषण से पीडि़त हैं। तो वहीं भ्रष्ट अफसरशाही कागजों में आंकड़ों के घोड़े दौड़ा रही है। भीतरी आंचलों में तो हालत बेहद ही खराब हैं जहां तमाम बच्चे कुपोषण के कारण बौने होते जा रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं में रक्ताल्पता की शिकायत देखने को मिलती है। कांकेर के दूरांचलों के लोग तो सरकारी योजनाओं के नाम तक नहीं जानते। उन्होंने यहां तक दावा किया कि यहां सरकारी अधिकारी कभी नहीं आते। ऐसे में सवाल तो ये कि करोड़ों रुपए की सरकारी सामग्री आखिर कौन डकार रहा है? राज्य में 25 लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की तादाद मुख्यमंत्री बताते हैं। तो वहीं आंकड़ों के हिसाब से 13 लाख बच्चे कुपोषित हैं। लगभग दो कार्यकर्ताओं के हिस्से में एक कुपोषित आ रहा है। फिर भी कुपोषण पर न नियंत्रण होना सरकारी अधिकारियों की मानसिकता पर ही सवालिया निशान लगाने के लिए काफी है। तो वहीं प्रदेश के आदिवासी कुपोषण का श्राप भोगने के लिए अभिशप्त।
13 लाख बच्चे नहीं संभाल पा रहे 25 लाख कर्मचारी, गरीबों तक नहीं पहुंचती सुविधाएं सरकारी
कांकेर।
बॉक्स-
क्या कहते हैं आंकड़े-
एक ओर प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री कुपोषण के 32 से घटकर 29.8 प्रतिशत होने का दावा कर रही हैं। तो वहीं आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 13 लाख बच्चे कुपोषित हैं। प्रदेश के सीएम कहते हैं कि पिछले एक दशक में आंगनबाड़ी केंद्रों की संख्या 21 हजार से बढ़कर 50 हजार हो गई है। इन केंद्रों में दैनिक पोषण पूरक भोजन प्राप्त करने वाली महिलाओं और बच्चों की संख्या 13 लाख से बढ़कर 25 लाख हो गई है।  राज्य में कुपोषण की दर 52 प्रतिशत से घटकर 32 प्रतिशत हो गई है जबकि इसे घटाकर 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ऐसे में सवाल तो यही कि क्या 25 लाख कर्मचारी नहीं दूर कर पा रहे हैं 13 लाख बच्चों का कुपोषण? जाहिर सी बात है कि ये सरकारी अधिकारियों के आंकड़ों का अंकगणित मात्र है। इसका जमीनी ह$कीकत से कोई सरोकार नहीं है।
क्या है अंदरूनी इलाकों का हाल-
 आमाबेड़ा से महज पांच किलो मीटर दूर बड़ेतेवड़ा गांव है। इस गांव में आदिवासियों के कच्चे मकान नजर आयेंगे। या फिर पेट निकले आदिवासियों के कुपोषित बच्चे दिखेंगे। अमूमन, यह स्थिति पूरे जिले की है। लेकिन, इस गांव के बच्चों तथा महिलाओं में कुपोषण को जानने-समझने के लिए किसी सरकारी आंकड़े की जरूरत नहीं है। आदिवासी समुदाय की सुशीला आचला गरीबी और गुमनामी में जी रही हैं।
सारी कहानी ग्रामीणों की जुबानी-
 सरकार ने इनके लिए बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान किया है, लेकिन सुशीला और उसके जैसे कई आदिवासियों से बात करके पता लगता है कि ये लोग सरकारी योजनाओं से अनजान हैं। सुशीला कहतीं है कि बीते दो साल से उसका बच्चा कुपोषण का शिकार है, और उसके इलाज के लिए शासन-प्रशासन कोई ध्यान नहीं दे रहा है। सुशीला कहती है कि सरकार हमारा ठीक से पालन-पोषण करे, और बेहतर इलाज की व्यवस्था कराए। अर्रा सेक्टर की प्रभारी शकुंतला श्रीवास्तव ने बताया कि अंतागढ़ एनआरसी केंद्र में जगह फुल होने के कारण कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए भर्ती नहीं कराया गया है। एऩआरसी सेंटर में जगह खाली होते ही कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए भेज दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि बच्चों के अभिभावक नशा करने के आदी होने के कारण बच्चों का सही तरीके से देखभाल नहीं करते हैं। इसके साथ ही परिवार नियोजन के उपायों को नहीं अपनाते है। 
महिलाओं में भी है खून की कमीं-
आमाबेड़ा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सक गौतम बघेल कहते है कि महिलाओं में कुपोषण बढऩे की प्रमुख वजह खून की कमी है, गर्भवती महिलाएं महुआ शराब तथा तंबाकू का सेवन करती हैं। महिलाओं को खाने के लिए आयरन की गोली दी जाती है लेकिन बे-स्वाद होने के कारण महिलाएं दवाई लेने से परहेज करतीं है।
कितनों को नहीं मिल रहा इलाज-
एनआरसी फुल, कुपोषित बच्चों के लिए जगह नहीं  अर्रा इलाके में करीब 18 गांवों के 29 गंभीर कुपोषित तथा 145 मध्यम कुपोषित बच्चों को इलाज नहीं मिल पा रहा हैं।
ताव में गोद लिया गांव, और दोबारा नहीं आए-
कुपोषण मिटाने के लिए सरकार ने सरकारी अधिकारियों को गांव गोद लेने की बात भी कही थी। शर्त थी कि कलेेक्टर और तमाम आलाअधिकारी एक-एक गांव गोद लेंगे। ताव में आकर इन अधिकारियों ने गांव तो गोद ले लिया मगर आज तक वहां दोबारा नहीं फटके। ऐसे में सवाल तो यही है कि क्या जरूरत थी गांव के भोलेभाले लोगों को ठगने की? क्या ये सिर्फ अखबारों में नाम छपवाने के लिए किया गया ड्रामा था?



Comments

Popular posts from this blog

पुनर्मूषको भव

कलियुगी कपूत का असली रंग

टूटी हड्डियां जोड़ने वाली लता