फूटी तकदीर लिए बेंचती हैं फुटू


 साक्षरता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले छत्तीसगढ़ की असलियत बयां करती ये तस्वीर कांकेर के अंतागढ़ ब्लॉक की पूसाघाटी की है। यहां आदिवासियों के बच्चे स्कूल छोड़कर सड़क के किनारे फुटू बेंचकर अपनी दो जून की सब्जी चावल का जुगाड़ करते हैं।  स्कूली गणवेश में फूटी तकदीर लिए फुटू बेंचते ये दोनों बच्चे आदिवासियों के हैं। शिक्षा विभाग के सारे दावे यहां हवाहवाई साबित हो रहे हैं। सवाल तो यही उठता है कि इनको शिक्षित करने की जवाबदेही आखिर किसकी है? प्रदेश सरकार खुद शिक्षा के अधिकार की धज्जियां उड़ा रही है। तो वहीं नई दिल्ली से मिला पुरस्कार इनको मुंह चिढ़ा रहा है।

शिक्षा के अधिकार का राज्य में उड़ाया जा रहा मजाक,

कांकेर ।
कविता और सुखवती बेंचती हैं मशरूम-
 जिला मुख्यालय से करीब 25 किलो मीटर दूर अंतागढ़ ब्लॉक के पूसाघाटी गांव की स्कूली छात्राएं पढ़ाई छोड़ कर मशरूम बेच रहीं हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहीं हैं। कविता और सुखवती ने बताया कि वे लोग कभी-कभार स्कूल भी जाती हैं, लेकिन अधिकतर समय वे रोजी-रोटी के लिए मशरूम इक_ा करने जंगल जातीं है। फिर बाद में उसे बेचने आमाबेड़ा मार्ग पर आतीं है। बच्चों ने कहा कि घर में सब्जी व चावल नहीं है, मशरूम बेचकर चावल और सब्जी खरीदेंगे। गांव में सरकारी स्कूल तो है लेकिन वे पढ़ाई करने कभी-कभार ही स्कूल जातीं है।
स्कूल से आज भी दूर हैं आदिवासियों के बच्चे-
 समझा जा सकता है कि जिनके बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हों, भला उनका जीवन स्तर कैसे सुधर सकता है। कहने को तो आदिवासियों के उत्थान के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है, ताकि ये आत्मनिर्भर हो सकें। लगता है पहाड़ और जंगल में रहकर कंदमूल खाने वाले इन आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे का प्रयास केवल सरकारी दस्तावेजों में सिमट कर रह गया है। इन बच्चों को देखकर आदिवासी इलाकों के स्कूलों की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी आदिवासी समुदाय का एक बड़ा तबका स्कूलों से दूर है।

शिक्षा व्यवस्था लचर
गांव में शिक्षा व्यवस्था काफी लचर है। पूसाघाटी गांव में स्कूल भी है और शिक्षक भी, वे पढ़ाने आते हैं लेकिन बच्चे नहीं आते। यही हाल आस पड़ोस के गांवों की है।

Comments

Popular posts from this blog

पुनर्मूषको भव

कलियुगी कपूत का असली रंग

टूटी हड्डियां जोड़ने वाली लता