आंकड़ों का फर्जीवाड़ा
प्रदेश में 13 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषण की चपेट में बताए जाते हैं। ये आंकड़े सरकारी हैं। तो वहीं राज्य में 25 लाख महिलाओं को आंगनबाडिय़ों से जोड़ा गया है। 2.5 लाख महिलाएं महतारी जतन योजना के तहत बच्चों को पोषाहार बांटने पर लगाई गई हैं। ये तमाम आंकड़े महानदी भवन के वातानुकूलित कमरों में बैठे बड़े-बड़े अधिकारियों ने गढ़े हैं। ये लोग कोई अशिक्षित नहीं काफी पढ़े लिखे लोग हैं। बस अंतर यही इतना है कि इनके ये आंकड़े असलियत से मेल नहीं खाते हैं। अब इनके आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि एक कुपोषित बच्चे पर दो कर्मचारी आते हैं। ऐसे में कुपोषण को तो कब का प्रदेश छोड़कर भाग जाना चाहिए था, मगर वो कमबख़्त अभी भी ज़ेर-ओ ज़बर के साथ डटा हुआ है। समझ में नहीं आता कि इन सरकारी घोषणाओं का क्या करें? इतने पर भी प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री कुपोषण घटने का दावा कर रही हैं। सरकार ने 25 फीसदी तक कुपोषण को लाने का लक्ष्य रखा है तो वे 29.8 प्रतिशत अभी भी कुपोषण की दर बता रही हैं। यानि महिला एवं बाल विकास विभाग अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब है। ये दीगर बात है कि इनका पोषाहार खाकर हजारों बच्चे अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं तो कइयों की जान तक जा चुकी है। तो वहीं सरकारी सुगंधित मीठा दूध पीकर दो आदिवासी बच्चियों की मौत तक हो चुकी है। ये मामला विधान सभा में भी उठाया गया था। जहां संबंधित मंत्री ने झूठा बयान देकर सदन को चुप करा दिया। ऐसे में प्रदेश की 2.55 करोड़ जनता की आस्था को भयानक चोट पहुंची है। ऐसे बयान लोकतंत्र के बड़े मंदिरों की आस्था को चोट पहुंचाते हैं लोगों का विश्वास इनसे डिगने लगता है। ऐसा ही छत्तीसगढ़ में कई मामलों में देखने को मिला। दु:ख तो इस बात का है कि सत्ता के जिम्मेदारों को इस बात से कोई सरोकार नहीं है। वे तो अपनी झूठ पर ही बार-बार कायम रहने की बात करते हैं। सरकार को चाहिए कि वो ऐसे मामलों में पूरी संवेदनशीलता बरते ताकि लोगों का विश्वास लोकतंत्र में कायम हो सके।
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