कोमा में स्वास्थ्य सेवाएं, बताओ लोग कहां जाएं






प्रदेश के सुखिया मुखिया राज्य में मेडिकल कालेज पर मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं। जो भी जी में आता है जमकर बोले जा रहे हैं। लोगों से सरकारी अस्पताल में वसूले जा रहे हैं पैसे। तो वहीं एम्बुलेंस में ढोया जा रहा खपरा और माल वाहन में मरीज....सवाल उठता है कि आखिर कैसे? दवाओं से ज्यादा मरीजों को पिलाई जा रही है डांट। कुछ बोलने पर सरकारी डॉक्टर लगता है लेंगे काट। सारे सरकारी दावे यहां मिलते हैं फेल। यहां बेधड़क चलता है पैसों का खेल। गरीबों की गरीबी का निकाला जा रहा है तेल। देखकर समझ में आता है कि कोमा में जा चुकी हैं प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं। ऐसे में सवाल तो यही  है कि अब ये बताओ कि लोग कहां जाएं?
१-सरकारी अस्पतालों में मरीजों से पैसे मांगते कर्मचारी, एम्बुलेंस से खपरा और माल वाहन में ढोए जा रहे मरीज
२-कागजों में घोषणाओं की भरमार, मौके पर नहीं मिलती देखने को दो चार
३-डॉक्टर्स का जारी है मिशन कमीशन-



 रायपुर/बलौदा बाजार/ बलरामपुर।

बलौदा बाजार के अस्पताल का हाल-
यहां 102 महतारी एक्सप्रेस,108 एम्बुलेंस, स्मार्ट कार्ड, चिरायु, जीवन दीप जैसी न जाने कितने प्रकार की महत्वकांक्षी योजनाएं सरकारी फाइलों में दौड़ाई जा रही हैं, पर इन योजनाओं से जनता को लाभ मिलता नहीं दिख रहा।  यहां 20 बेड का अस्पताल है जहां 6 डॉक्टर सहित, कुल 29 स्टाफ हैं, फिर भी कोई इलाज कराने को तैयार नहीं।  लोगों का कहना है कि यहां इलाज के नाम पर सुविधा कम और पैसे ज्यादा हैं।  यहीं नहीं यहां डॉक्टरों की मौजूगी दिन में ही रहती है , रात को कोई डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं रहता, मरीज इलाज के लिए तड़पते रहते हैं।
मरीजों ने लगाए पैसे देने के आरोप-
एक मरीज का दावा है कि उसकी पत्नी के प्रसव के लिए उससे 500 रुपए मांगे गए। ब्लाड टेस्ट, यूरीन टेस्ट करने के भी पैसे लिए गए, इतना ही नहीं मेरी पत्नी को प्रसव के दौरान लगने वाले इंजेक्शन को मुझे खरीद कर वापस जमा करने को कहा गया और प्रसव के बाद मिलने वाली राशि में से 50 रुपए और काटे गए।
वाड्रफनगर में माल वाहन में ले जाया गया मरीज
बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर ब्लाक में फैली डायरिया और मलेरिया की बिमारी के बीच ये नजारा तब देखने को मिला जब क्षेत्र के बरती भगवानपुर मे उल्टी दस्त से पीडित एक बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना था। अस्पताल ले जाने के लिए बुजुर्ग के घर वालो ने शासकीय एम्बुलेंस बुलवाने का प्रयास किया, लेकिन उसके नहीं आने पर परिजनों को गांव के पिकप वाहन मे निर्मित जुगाड के एम्बुलेंस में अस्पताल तक लाना पडा ! ये जुगाड का एम्बुलेंस गांव वालों ने स्वास्थ विभाग की उदासीनता के बाद खुद के खर्चे से बनाया है ! बाद मे लोगों से पूछताछ में पता चला कि पिछले 15 दिन से कई बीमार लोगों को इसी जुगाड की एम्बुलेंस मे सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र तक लाया गया ।
सरकारी एम्बुलेंस से ढोया जा रहा खपरा-
शासकीय वाहनों का किस-किस प्रकार दुरुपयोग किया जाता है इसका जीता-जागता उहादरण बलरामपुर जिले के रामानुजगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में देखा जा सकता है। केंद्र में संचालित एक मात्र एम्बुलेंस जो कि मरीजों को लाने- ले जाने में उपयोग किया जाना चाहिये, वहीं केंद्र में एम्बुलेंस का उपयोग खपरा ढुलवानें सहित अन्य सामान ढोने के काम में लिया जा रहा है। ऐसे में सवाल तो यही कि क्या सरकार किसी को भी सरकारी एम्बुलेंस के ऐसे दुरुपयोग की अनुमति देती है? जरूरी सेवाओं का मजाक बनाने वालों पर अब तक कठोरतम कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
बांस पर टिकी रहती है गरीबों की आस-
प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्रालय कितने ही बड़े-बड़े दावे कर ले, मगर असलियत यही है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का बेहद बुरा हाल है। यहां इंसान को बांस के सहारे ढोकर लोग अस्पताल पहुंचाते हैं। ये फोटो मैनपाट की है जहां डायरिया  फैला था और बड़ी तादाद में मांझी आदिवासियों की मौत हुई थी। हमारी सरकार ने इस मामले को भी प्राथमिकता से उठाया था।
बॉक्स-
बात भी करने को तैयार नहीं स्वास्थ्य मंत्री-
इस मामले में जब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उनके जिम्मेदार अधिकारी ने बताया कि साहब अभी कुरुद में एक कार्यक्रम में व्यस्त हैं। लगातार उनसे कई बार संपर्क किया गया उसके बाद भी वही रटारटाया उत्तर मिला। सवाल तो ये है कि क्या व्यवस्था के साथ-साथ मंत्री भी निरंकुश हो चले हैं? ऐसे मंत्रियों के रहने न रहने से क्या फायदा? सरकार इनको किस बात का इतना मोटा पैसा भुगतान करती है? इतनी सुविधाएं ये जिस गरीब जनता की भलाई के नाम पर लेते हैं उसके लिए भी इनके पास वक्त नहीं है?
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