बड़को गांव के लोगों का बड़ा काम






न हमसफर न किसी हम नशीं से निकलेगा, हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा। जी हां इन बातों को सही साबित कर दिखाया कोंडागांव के बड़को गांव के ग्रामीणों ने। जब उनके गांव की एक महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी और ग्रामीणों का रास्ता रोके बह रही थी एक नदी। इन लोगों ने फैसला किया कि इसको तत्काल बांधना पड़ेगा। बस फिर क्या था गांव के सभी मर्दों ने कमर कस ली। उठाया टंगिया, तगाड़ी, फावड़ा और कुदाल। इसके बाद शुरू हो गया नदी पर पुल बनाने का अभियान। इस घटना में सबसे अहम बात जो देखने को मिली वो ये कि इनके जिला पंचायत अध्यक्ष ने भी पूरी ताकत के साथ ग्रामीणों की इस काम में मदद की। तो वहीं हर कोई अपने पैर के इस कांटे को निकालने में पूरी ताकत झोंक दिया। जंगलों से लकडिय़ों का जुगाड़ किया गया। तो वहीं आसपास से मिट्टी खोदकर लाई गई। हर किसी ने सिर पर तगाड़ी में भर कर मिट्टी ढोई तो वहीं मर्दों ने कंधे पर लकड़ी के खंभे ढोए। तो कुछ लोगों ने उसको बहती नदी में टिकाने के लिए जुगाड़ लगाया। इसके  बाद तब कहीं जाकर दो दिनों में पुल तैयार हुआ और उस महिला को मर्दापाल अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीणों को ये बात साफ तौर से पता थी कि अगर सरकार के भरोसे रहेंगे तो महिला की जान चली जाएगी। इस लिए इन ग्रामीणों ने जिद कर नदी पर काठ का पुल खड़ा कर दिया। आज उसी पुल से होकर न सिर्फ इनके बच्चे पढऩे जाते हैं बल्कि इनको भी बाजार तक जाने की सहूलियत हो गई। वैसे भी हमारे दर्शनशास्त्र में कहा गया है कि कार्य की सिध्दि करने से होती है। इच्छा करने से नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे सोते सिंह के मुंह में कोई हिरण नहीं जाता है।

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