पड़ोसी का मुर्गा
कटाक्ष-
निखट्टू
एक नेता जी के घर अक्सर पड़ोसी का मुर्गा चरने चला आया करता था। नेता जी बड़े समाजवादी किस्म के थे। तो वहीं नेताइन थोड़ा तेज किस्म की। एक दिन जब नेता जी विधान सभा की बैठक में गए थे तो नेताइन से नहीं रहा गया। उन्होंने उस मुर्गे का चुपचाप काम तमाम कर दिया। अब नेता जी के लौटने पर उनको गोश्त दिया जाने लगा। नेता जी पूरे ईमानदार थे उन्होंने पूछा कि तुमको ये मुर्गा कहां से मिला। नेताइन ने कहा कि अरे आप पेड़ क्यों गिनते हैं आम खाइए। अब तो नेता जी का शक गहरा गया। उन्होंने कहा नहीं बताओ ......नेताइन ने कहा कि मैंने बगल वाले का मुर्गा चोरी से काट कर बना दिया। नेता ने कहा तब तो ये माल चोरी का है मैं नहीं खाऊंगा। नेताइन ने भगोना बगल रख दिया और नेता जी की थाली में सब्जी और रोटियां डाल दीं। अब सामने मुर्गे का मीट देख नेता जी की नीयत डोली। उन्होंने पत्नी से कहा कि अरे मीट नहीं तो न सही कम से कम उसका शोरबा तो खा ही सकता हूं। जब नेताइन भगोने से शोरबा गिराने लगीं तो कुछ छोटे-छोटे पीस भी गिरने लगे तो नेताइन ने उनको हाथ से रोकना चाहा। नेता जी ने कहा अरे रोकती क्यों हो जो बोटियां स्वेच्छा से आ रही हैं उनको आने दो । नेताइन ने तंज कसते हुए कहा अरे... आप भी गजब करते हैं। मुर्गा भी तो अपनी मर्जी से ही आया था। उसे हमने थोड़े बुलाया था। इस पर नेता जी ने कहा अच्छा। इसके बाद वे अपनी असलियत पर आ गए और ढाई किलो का मुर्गा अकेले पचा गए। हमारे रडार पर तो राज्य के भी कई ऐसे समाजवादी किस्म के नेता आ रहे हैं जो पड़ोसियों का मुर्गा आराम से पचा रहे हैं। तो समझ गए न सर....अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर। तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
निखट्टू
एक नेता जी के घर अक्सर पड़ोसी का मुर्गा चरने चला आया करता था। नेता जी बड़े समाजवादी किस्म के थे। तो वहीं नेताइन थोड़ा तेज किस्म की। एक दिन जब नेता जी विधान सभा की बैठक में गए थे तो नेताइन से नहीं रहा गया। उन्होंने उस मुर्गे का चुपचाप काम तमाम कर दिया। अब नेता जी के लौटने पर उनको गोश्त दिया जाने लगा। नेता जी पूरे ईमानदार थे उन्होंने पूछा कि तुमको ये मुर्गा कहां से मिला। नेताइन ने कहा कि अरे आप पेड़ क्यों गिनते हैं आम खाइए। अब तो नेता जी का शक गहरा गया। उन्होंने कहा नहीं बताओ ......नेताइन ने कहा कि मैंने बगल वाले का मुर्गा चोरी से काट कर बना दिया। नेता ने कहा तब तो ये माल चोरी का है मैं नहीं खाऊंगा। नेताइन ने भगोना बगल रख दिया और नेता जी की थाली में सब्जी और रोटियां डाल दीं। अब सामने मुर्गे का मीट देख नेता जी की नीयत डोली। उन्होंने पत्नी से कहा कि अरे मीट नहीं तो न सही कम से कम उसका शोरबा तो खा ही सकता हूं। जब नेताइन भगोने से शोरबा गिराने लगीं तो कुछ छोटे-छोटे पीस भी गिरने लगे तो नेताइन ने उनको हाथ से रोकना चाहा। नेता जी ने कहा अरे रोकती क्यों हो जो बोटियां स्वेच्छा से आ रही हैं उनको आने दो । नेताइन ने तंज कसते हुए कहा अरे... आप भी गजब करते हैं। मुर्गा भी तो अपनी मर्जी से ही आया था। उसे हमने थोड़े बुलाया था। इस पर नेता जी ने कहा अच्छा। इसके बाद वे अपनी असलियत पर आ गए और ढाई किलो का मुर्गा अकेले पचा गए। हमारे रडार पर तो राज्य के भी कई ऐसे समाजवादी किस्म के नेता आ रहे हैं जो पड़ोसियों का मुर्गा आराम से पचा रहे हैं। तो समझ गए न सर....अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर। तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
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