मक्के की रोटी और चाऊमीन
कटाक्ष-
निखट्टू-
संतों...हिंदी में एक मुहावरा है- पानी पी-पीकर कोसना। हमारे एक पड़ोसी ऐसे हैं जो हमारा पानी पीकर हमें कोसते हैं। हमारी ही सब्जियां भी भकोसते हैं। इसके बाद अब पूरी दुनिया में हमीं को बदनाम करने की झूठी जिम्मेदारी अपने कुछ झु_ों को दे दी है। हमारे ही घर के प्राणियों को उनके पोषित कुछ जानवर नुकसान भी पहुंचाते हैं। पिछले सात दशकों से हम ये अत्याचार लगातार भोगते आ रहे हैं। कई बार उसके अत्याचार ज्यादा होने पर उसे दो-चार झापड़ रसीद भी कर चुके हैं, मगर वो है बड़ा बत्तमीज़ किस्म का। इसको वो अपनी शान समझ लेता है। हमको कभी हलबा-हथियार तो कभी अपने ङ्क्षहसक जानवरों का भय दिखाता है। हमारे घर के कुछ मक्कार भी उसके घर करते हैं आना-जाना। मामूली सी मक्के की रोटी खाकर अपने घर की बातें उसे बताते हैं। उसके हर दर्द को अपना दर्द बताते हैं। समझ में नहीं आता कि आ$िखर इन मक्कारों को मक्के की रोटियां क्यों इतना भाती हैं। हमारे गेहूं की रोटियों और बासमती चावल से इनको बदबू आती है। जो गैर के घर की मक्के की रोटियां इतना चटखारा ले-लेकर खाते हैं, हमेशा-हमेशा के लिए उसी के घर क्यों नहीं चले जाते हैं? हम भी जानते हैं ये असलियत कि रोज-रोज दूसरे के घर ऐसों का पेट नहीं पलता है। पड़ोसी के मक्के की रोटियों से किसी का काम नहीं चलता है। कुछ साल पहले कुछ गोरे लोगों ने भी लिया था उनकी मक्के की रोटी का चटखारा। इसके बाद उनको ऐसा फटकारा कि आज तक उसके घर की ओर करवट करके भी नहीं सोते हैं। हमारे घर आकर उसी का रोना रोते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं। जो हमारा ही पानी पीकर बहा रहे हैं हमारे ही घर के लोगों का खून, जी करता है कि उनको मक्खन के पैकेट में भर कर भेज दें चून। उधार की हैकड़ी अपने आप घट जाएगी। एक बार चखने भर से आंत कट जाएगी। उन्होंने हमारे खिलाफ खूब साजिश है रचा मगर हमारे दांव पर उनके चचा भी नहीं सकेंगे उनको बचा। क्योंकि वो दवाएं नहीं इनको खिलाएंगे चाऊमीन और पैसे में नापेंगे इनकी जमीन। दो दशकों में बदल देंगे इनके घर का सारा सीन। क्यों समझ गए न सर..... तो अब हम भी निकल लेते हंै अपने घर। कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
निखट्टू-
संतों...हिंदी में एक मुहावरा है- पानी पी-पीकर कोसना। हमारे एक पड़ोसी ऐसे हैं जो हमारा पानी पीकर हमें कोसते हैं। हमारी ही सब्जियां भी भकोसते हैं। इसके बाद अब पूरी दुनिया में हमीं को बदनाम करने की झूठी जिम्मेदारी अपने कुछ झु_ों को दे दी है। हमारे ही घर के प्राणियों को उनके पोषित कुछ जानवर नुकसान भी पहुंचाते हैं। पिछले सात दशकों से हम ये अत्याचार लगातार भोगते आ रहे हैं। कई बार उसके अत्याचार ज्यादा होने पर उसे दो-चार झापड़ रसीद भी कर चुके हैं, मगर वो है बड़ा बत्तमीज़ किस्म का। इसको वो अपनी शान समझ लेता है। हमको कभी हलबा-हथियार तो कभी अपने ङ्क्षहसक जानवरों का भय दिखाता है। हमारे घर के कुछ मक्कार भी उसके घर करते हैं आना-जाना। मामूली सी मक्के की रोटी खाकर अपने घर की बातें उसे बताते हैं। उसके हर दर्द को अपना दर्द बताते हैं। समझ में नहीं आता कि आ$िखर इन मक्कारों को मक्के की रोटियां क्यों इतना भाती हैं। हमारे गेहूं की रोटियों और बासमती चावल से इनको बदबू आती है। जो गैर के घर की मक्के की रोटियां इतना चटखारा ले-लेकर खाते हैं, हमेशा-हमेशा के लिए उसी के घर क्यों नहीं चले जाते हैं? हम भी जानते हैं ये असलियत कि रोज-रोज दूसरे के घर ऐसों का पेट नहीं पलता है। पड़ोसी के मक्के की रोटियों से किसी का काम नहीं चलता है। कुछ साल पहले कुछ गोरे लोगों ने भी लिया था उनकी मक्के की रोटी का चटखारा। इसके बाद उनको ऐसा फटकारा कि आज तक उसके घर की ओर करवट करके भी नहीं सोते हैं। हमारे घर आकर उसी का रोना रोते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं। जो हमारा ही पानी पीकर बहा रहे हैं हमारे ही घर के लोगों का खून, जी करता है कि उनको मक्खन के पैकेट में भर कर भेज दें चून। उधार की हैकड़ी अपने आप घट जाएगी। एक बार चखने भर से आंत कट जाएगी। उन्होंने हमारे खिलाफ खूब साजिश है रचा मगर हमारे दांव पर उनके चचा भी नहीं सकेंगे उनको बचा। क्योंकि वो दवाएं नहीं इनको खिलाएंगे चाऊमीन और पैसे में नापेंगे इनकी जमीन। दो दशकों में बदल देंगे इनके घर का सारा सीन। क्यों समझ गए न सर..... तो अब हम भी निकल लेते हंै अपने घर। कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
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