न डॉक्टर न दवाई फिर भी दावे हवाहवाई
- प्रदेश के डॉक्टर मुखिया की विधान सभा में दुखियों की ओर कोई देखने वाला तक नहीं है। मेडिकल कॉलेज में अच्छे इलाज की आस में आने वाले इन गरीबों की ऐब बताकर जेब तराशी हो रही है। मरीजों का कहना है कि हमें यहां दवाएं तक बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। तो मेडिकल कालेज के अधीक्षक दवाओं के स्टॉक होने का दावा करते हैं। उन्होंने ये भी माना कि सारी चीजों की जानकारी उनको नहीं है। तो वहीं मरीजों के परिजनों का आरोप है कि दोपहर 3 बजे के बाद यहां आने वाले मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों को रेफर किया जा रहा है। ऐसे में सवाल ये कि क्या यही है प्रदेश के मुख्यमंत्री के विधान सभा का मेडिकल कॉलेज और अस्पताल?
१-सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गया राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज
२-मरीजों के तीमारदार बाहर से खरीदते हैं दवाएं और अधीक्षक दिखा रहे स्टॉक
३-सरेआम चल रहा मिशन कमीशन, डॉक्टर्स की मनमानी पर अधीक्षक डाल रहे पर्दा
राजनांदगांव। प्रदेश के मुख्यमंत्री के विधानसभा और सांसद पुत्र के क्षेत्र में स्वस्थ को लेकर कभी भी गंभीर नहीं दिखाई दे रहे है। जिला मेडिकल कॉलेज के नाम से जिला भर से रोजाना करीब 500से 600 मरीज रोज जिला मेडिकल कॉलेज में इलाज के नाम से आते है। लेकिन इलाज तो दूर की बात है ।
पैसे लेकर हो रहा गरीबों का इलाज-
गरीब मरीजों का यहां खली पैसों से ही इलाज होता है। हर बात के पैसे मांगे जा रहे हैं। इसके अलावा जो देने में असमर्थ हैं, उनके साथ अस्पताल प्रबंधन का रवैया भी किसी हिटलर से कम नहीं लगता।
ये टेस्ट करवाने पड़ते हैं बाहर-
लैब में कोई भी जांच नहीं होती है जैसे -सीबीसी की जांच ,एच आई वी,
ईसीजी की जांच, अन्य प्रकार की जांच के लिए गरीब
मरीजों को बहार के लैब से जांच करनी पड़ती है।
मिशन कमीशन जारी-
आज ये बात हर कोई जानता है कि टेस्टिंग लैब बड़ी हो या छोटी। जो डॉक्टर मरीज को उन्हें रेफर करते हैं उनको एक निश्चित रकम गोपनीय ढंग से चल रही है। यही हाल प्राइवेट अस्पतालों का भी है वहां भी जो मरीज रेफर करता है उस डॉक्टर को कुछ न कुछ छिपे तौर पर मिलता है। ये बात तो हर कोई जानता है। तो वहीं मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स भी डॉक्टर्स को लगातार प्रलोभन देकर अपनी ब्रांडेड दवाएं प्रेस्क्राइब करवाते हैं। सवाल तो ये है कि जब अस्पताल के अधीक्षक ये दावा करते हैं कि उनके स्टॉक में दवाएं हैं तो डॉक्टर्स बाहर की दवाएं आखिर मरीजों को क्यों लिख रहे हैं? इससे ये बात भी साफ हो जाती है कि कहीं न कहीं तो गलती जरूर हो रही है।
3 बजे के बाद हो जाता है रेफरल सेंटर-
गर्भवती महिलाओं को भी 104 द्वारा जिला भर से मेडिकल कॉलेज में लाया जाता है। सुबह 8से 2 बजे तक तो डॉक्टर भगवान होते हैं, लेकिन दोपहर 3 बजे के बाद निजी अस्पतालों में रैफर का खुलेआम खेल चलता है । ऐसा नहीं की मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन को मालूम नही है। कि अस्पताल में कौन डॉक्टर ड्यूटी में खेल कर रहा है। लेकिन गरीब ग्रामीण गर्भवती महिलाओं को आपरेशन के नाम से और सोनोग्राफी के
नाम से गरीब लोगों को खुलेआम निजी अस्पताल में रेफर का खेल चला रहा है।
अधीक्षक ने भी माना संसाधनों के अभाव की बात-
मेडिकल कालेज के अधीक्षक डॉ. के.के. सहारे ने माना कि सारी चीजें उनके संज्ञान में नहीं हैं। लगे हाथ उन्होंने ये भी दावा किया कि उनके मेडिकल कॉलेज में संसाधनों का अभाव है। ऐसे में इतनी बड़ी तादाद में आने वाली भीड़ को संभालना नामुमकिन काम है।
6 सौ मरीज रोज और डॉक्टर्स कम -
डॉक्टर सहारे ने बताया कि पहले यहां 150 मरीज रोज आया करते थे। आज 6 सौ से भी ज्यादा लोग आते हैं। ऐसे में सीमित संसाधनों के चलते उनको उतनी सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। उन्होंने ये भी बताया कि मेडिकल कॉलेज में जितने डॉक्टर्स होने चाहिए उतने नहीं हैं। यहां तमाम विषय विशेषज्ञों की कमी है।
दवाओं की बात पर दिखाने का दावा-
जैसे ही मेडिकल कॉलेज में दवाओं की कमी की बात की गई। डॉक्टर सहारे ने कहा कि आप आइए मैं आपको पूरा स्टॉक दिखाता हूं। हमारे यहां हर तरह की दवाएं सुरक्षित ढ़ंग से रखी गई हैं। यहां से इनका मरीजों को नियमित रूप से वितरण किया जाता है।
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