बेकार साबित होती सरकार
जनता से कर लेकर आनंद कर रही प्रशासनिक मशीनरी की लापरवाही का इससे बड़ा नमूना शायद ही किसी ने देखा हो। सरकार हर साल बजट में स्वास्थ्य विभाग को अरबों रुपए की दवाएं और जरूरी उपकरण मुहैय्या कराने का दावा करती है। उतनी दवाएं खरीदी भी जाती हैं या नहीं ये कोई नहीं बता सकता। आलम ये है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवाएं बाहर से लाने के लिए लिख दिया जाता है। ये इस बात को साबित करता है कि दवाओं की या तो खरीदी नहीं की जाती। यदि की भी जाती होगी तो उसमें कमीशनखोरी किस पैमाने पर होगी ये तो अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों के परिजनों से ज्यादा कोई भी नहीं समझ सकता है। हद तो तब हो गई जब प्रदेश के बलरामपुर जिले से दो परस्पर विरोधी किस्म की खबरें सामने आईं। एक ओर तो यहां लोगों को बांस पर ढोकर लोग अस्पताल ले जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर एम्बुलेंस से खपरा ढोया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की इस संवेदनहीनता की जितनी भी मज़म्मत की जाए कम होगी। अस्पतालों के डॉक्टर्स जहां मरीजों से ज्यादा मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स से बात करने में मस्त हों। दवाओं के कमीशन के रेट जिनके प्राइवेट चैंबर्स में तय किए जाते हों। सबसे बड़े अस्पताल का हाल ही बेहाल हो। स्वास्थ्य मंत्री के पास मामले को सुनने तक का समय न हो तो ऐसे मंत्री के रहने न रहने से भला क्या लाभ? सरकार क्यों ढो रही है ऐसे लोगों को?
वैसे भी सरकार इस बार कुछ ज्यादा ही संवेदनहीन हो चली है। ठीक उसी तरह जैसे पिछली बार नई दिल्ली में मनमोहन सिंह की सरकार हो चली थी। निर्भया की मौत पर पूरा देश चीखता रहा मगर मनमोहन सिंह ने कुछ नहीं कहा। उसके बाद आए चुनाव में देश की जनता ने कांग्रेस को उसकी असली औ$कात याद दिला दी। बहुत हद तक संभव है कि आने वाले चुनावों में प्रदेश में भाजपा की भी वही हाल हो। ऐसे में अभी भी समय है अगर अपनी दशा और दिशा सुधार सकते हों तो सुधार लें। नहीं तो जनता इनको खुद सुधार देगी इसमें कोई दो राय नहीं है।
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