हिंदुस्तान का पाड़ा पुराण

खटर-पटर-

निखट्टू-
संतो.... एक ग्वाला रोज अपनी भंैस जब दुहने जाता था, तो एक बच्चा उसी के यहां से दूध खरीदने जाता था। ग्वाला सबसे पहले भैंस के पांड़े (नर बच्चे) को छोड़ देता था। पाड़ा अपने सिर से अपनी मां के थन को लगातार स्नेह से सहलाता और फिर जैसे ही उसकी मां के स्तनों में दूध आ जाता। ग्वाला झट से उस पाड़े को खूंटे से ले जाकर बांध देता। इसके बाद भैंस का सारा दूध निचोड़ लेता। उसके बाद वो यही क्रम रोज दुहराता था। एक रोज ये बच्चा थोड़ा पहले तबेले में जा पहुंचा। उधर ग्वाला किसी झमेले में फंसा था तो  वो आ नहीं पाया। इधर बच्चा खेलता-खेलता उसी भैंस के पाड़े के पास गया । पाड़े से बच्चे ने पूछा कि भैया मैं तो उबाला हुआ दूध पीता हूं तो मीठा लगता है। तुम बताओं के तुम्हारी मां का कच्चा दूध तुम्हें कैसा लगता है। पाड़ा चुप हो गया। बच्चे ने फिर वही सवाल दुहराया....पाड़ा चुप रहा। अब बच्चे की समझ में आया कि शायद ये अपने मालिक के भय से नहीं बता रहा है। उसने पाड़े को आश्वासन दिया, कि वो उसके मालिक यानि ग्वाले को ये बात बिल्कुल भी नहीं बताएगा। तब पाड़े ने कहा तुम अपना सवाल दोहराओ। बच्चे ने कहा भाई पाड़े तुम्हारी मां के कच्चे दूध का स्वाद कैसा होता है बताओ? पाड़े ने कहा जैसे खूंटा.....। सुनते ही बच्चा सन्न रह गया। उसको ऐसे किसी भी जवाब की आशा नहीं थी। बेचारा एक बारगी चकरा गया, लगा कि उसका तो एकदम सिर ही घूम जाएगा। उसने कहा कि भाई पाड़ा जी ये क्या मजाक है। पाड़े ने रुंधे गले से कहा मैंने आपको जो बात बताई है वो सौ फीसदी सच्ची है। इस ग्वाले की इसी लालच की वजह से मेरे तमाम भाई दूध के अभाव में मर गए। मैं दूध नहीं चावल के मांड़ पर जिंदा हूं। मुझे उसी का स्वाद पता है....और इस देश में ईमानदार को अगर ये चावल का मांड़ भी भरपेट मिल जाए तो समझ लेना बहुत बड़ी बात है।  बड़े आए हैं दूध का स्वाद पूंछने? भीख मांगने वाले से गांव की कीमत पूछ रहे हो बाबू? अच्छा कर रहे हो। अरे हम तो फ$कीरों से भी गए बीते और रीते हैं। उनको तो हर कोई दौड़-दौड़कर कुछ न कुछ दे ही देता है। हमारी झोली की ओर कोई नहीं देखता। अलबत्ता अगर रात को कभी भूख से दो चार बात निकल आती है तो वो मोटी मालकिन मुझे मोटे डंडे से पीटती है। मैं जब सुबह ठीक से चल नहीं पाता तो मेरे गले में बंधी रस्सी से मुझे घसीटती है। मेरी मां का सारा दूध निचोड़ कर अपने बच्चों को मिला देती है। उससे बचता है तो आप लोगों को बेच देती है। और मुझे पलना पड़ रहा है चावल के मांड़ से, ऐसी व्यवस्था जाए चूल्हे भाड़ में। क्यों समझ गए न सर.... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर..... तो फिर कल आपसे मुलाकात होगी... तब तक के लिए जय....जय।

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