फजीहत जनता की, नसीहत सरकार को
सुराज की सरकार गर्मी में जहां तहां लगाती फिरती है बड़े-बड़े दरबार। गांवों के खेत-खार में उतरता है सीएम का उडऩ खटोला। उसके बाद लगती है अधिकारियों की चौपाल। काम थोड़ा प्रचार ज्यादा। फोटो खींची गईं और हो गया काम। तो इधर अधिकारियों ने भी न सुधरने की कसम खा रखी है। फसल बीमा योजना के मुआवजे में जहां लोगों को एक, पांच, आठ, तीस, सत्तर और ढाई सौ के चेक राज्य के किसानों को मिले। तो वहीं पेट्रोल पंप के मालिकों को बीस से तीस हजार रुपए के चेक बांटे गए। जगदलपुर में इंजीनियर्स और डॉक्टर्स के पास गरीबी रेखा का कार्ड है। तो वहीं सूरजपुर के आदिवासियों का नाम तक गरीबी रेखा की सूची में नहीं चढ़ा। तमाम खबरों के प्रकाशित होने के बावजूद भी शासन -प्रशासन के अधिकारियों ने उन गरीबों के साथ इस तरह के दोयम दर्जे का बर्ताव क्यों किया? ये एक विचारणीय प्रश्र है। सरकार हर साल बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर एक मोटी रकम की घोषणा करती है। अस्पतालों में गरीबों और जरूरतमंदों को दवाएं कितनी मिलती हैं? ये बात किसी को भी नहीं मालूम। गरीबों के राशन से लेकर केरोसीन तक में सरकारी भ्रष्टाचार समाया हुआ है। ऊपर से अधिकारियों को सरकार सातवां वेतनमान दे रही है। सवाल तो ये भी उठता है कि आखिर किस काम के लिए इनको इतनी मोटी रकम दी जा रही है? इंजीनियर्स और डॉक्टर्स का नाम गरीबी रेखा में शामिल करने के लिए। या फिर उस गरीब आदिवासी का नाम गरीबी रेखा वाले रजिस्टर में न दर्ज करने के लिए। या फिर पखांजुर में मुर्दों के नाम पंप खरीदवाने के लिए। समझ में नहीं आता कि इस व्यवस्था को कोई क्या कहे। इन लोगों ने हर चीज की अति कर दी है। शिक्षा स्वास्थ्य, सुरक्षा सबका हाल बेहाल है। सरकार टैक्स लेकर अपना खजाना तो भर रही है,मगर जनता की जरूरतों को पूरा करने का न तो उसके पास समय है, और न ही संसाधन। ऐसे में जनता की यहां सुनने वाला कोई नहीं है।भाग्य ने अगर साथ दिया तो किसी अधिकारी ने कुछ सुन लिया। नहीं तो कोई भी यहां किसी की सुनने को तैयार नहीं।
सरकार अगर वास्तव में गरीबों की हितैषी है तो सबसे पहले इन अधिकारियों के कामों की मॉनिटरिंग की जाए। वेतनमान सातवां नहीं दसवां हो मगर अधिकारियों के प्रदर्शन के आधार पर ही इसको दिया जाए। इसके अलावा अगर कोई अधिकारी किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है तो तत्काल प्रभाव से उसकी सेवाएं समाप्त की जानी चाहिए। चाहे वो कोई भी हो। इसके अलावा काम को लेकर बिल्कुल एक साफ और सपाट मापदंड होना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार की कोई सियासत न हो। अगर कोई इस मामले पर राजनीति करना चाहता हो तो उसको सख्त से सख्त सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। यदि इन बातों पर सरकार एक बार ठंडे मन से विचार करेगी तो प्रदेश ही नहीं देश की अफसरशाही की मानसिकता में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे। इससे एक ओर जहां जरूरतमंदों को सहायता मिलेगी, वहीं गरीबों का ह$क भी असली आदमी तक पहुंच सकेगा।
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