कौन बाबा किसका घर
खटर-पटर-
निखट्टू-
संतों...एक बार एक विचित्र बाबा से मेरा पाला पड़ गया। मैं एक जगह बेहद जरूरी काम से जा रहा था। रास्ते में एक साधु मिल गए। मैंने उनको प्रणाम किया, बोले कैसा प्रणाम क्यों आशीष? खैर मैंने पूछा बाबा आपका आश्रम कहां पर है। बोले कैसा बाबा कहां का आश्रम? तब तक पुलिस का दरोगा आ गया बोला बाबा आपका घर कहां है? कौन बाबा किसका घर? अरे बाबा मैं आपका घर पूंछ रहा हूं। साधु बोला कौन बाबा किसका घर? दरोगा गुस्से में आ गया बोला अभी पीठ पर आठ बेंत मारूंगा तो सब समझ में आ जाएगा। साधु बोला... किसकी पीठ कैसा बेंत? इससे पहले कि वो दरोगा और गुस्से से पागल होता मैंने उसको पीछे खींचा और दूसरी ओर ले गया। बाबा अपनी ही धुन में मस्त रहा।
ऐसे ही हमारे भी देश में कई ऐसे बाबा पैदा हो गए हैं। जिनको हर चीज का सुबूत इस लिए खोजना है ताकि वे दुनिया की निगाह में हीरो बने रहें। यही उस बाबा और इन लोगों में मूलभूत अंतर है। बाबा खुद का अस्तित्व मानने से इंकार कर रहा है मगर ये लोग अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सुबूतों को खोजने पर आमादा हैं। यही कारण है कि इस देश में हर चीज को लेकर सियासत शुरू हो जाती है। देश के कुछ बयानवीरों की आदत बनती जा रही है। वे अपनी करनी से बाज़ नहीं आने वाले। अपना फटा पाजाम जिनको नहीं दिखाई देता मगर दूसरे के पैंट की पिन होल पर भी ऐसे नज़रें गड़ाते हैं गोया वो ब्लैकहोल हो? समझ में नहीं आता कि देश किस ओर जा रहा है। बयान के असल सरोकार से भी कोई मतलब नहीं रखा जाता बस बोलना था तो बोल दिया। उसका मतलब कुछ भी निकले, कोई फर्क नहीं है। ऐसे ही लोग अब सर्जिकल स्ट्राईक पर मांग रहे थे सेना से सुबूत तो सेना कोई नेता तो है नहीं। उसने सुबूत इनके थोबड़े पर दे मारा। अब सब की बोलती हो गई बंद, बेशर्मों की तरह अपना सा मुंह लेकर खड़े हो गए तो कुछ ने अपनी-अपनी कारों का कालाशीश चढ़ा लिया। अब ऐसे में सवाल तो ये है कि अब भारत माता पूछ रही है कि क्या ये नेता ईमानदार हैं?अगर हैं तो मेरे बहादुर बेटों की ईमानदारी का सुबूत पाने के बाद अपने-अपने कुकर्मो के सुबूत पेश करें और नैतिकता के आधार पर अपनी -अपनी कुर्सी छोड़ दें। ऐसे लोगों को कुर्सियों पर बने रहने का कोई भी अधिकार नहीं है, क्यों समझ गए न सर.... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर। तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
निखट्टू-
संतों...एक बार एक विचित्र बाबा से मेरा पाला पड़ गया। मैं एक जगह बेहद जरूरी काम से जा रहा था। रास्ते में एक साधु मिल गए। मैंने उनको प्रणाम किया, बोले कैसा प्रणाम क्यों आशीष? खैर मैंने पूछा बाबा आपका आश्रम कहां पर है। बोले कैसा बाबा कहां का आश्रम? तब तक पुलिस का दरोगा आ गया बोला बाबा आपका घर कहां है? कौन बाबा किसका घर? अरे बाबा मैं आपका घर पूंछ रहा हूं। साधु बोला कौन बाबा किसका घर? दरोगा गुस्से में आ गया बोला अभी पीठ पर आठ बेंत मारूंगा तो सब समझ में आ जाएगा। साधु बोला... किसकी पीठ कैसा बेंत? इससे पहले कि वो दरोगा और गुस्से से पागल होता मैंने उसको पीछे खींचा और दूसरी ओर ले गया। बाबा अपनी ही धुन में मस्त रहा।
ऐसे ही हमारे भी देश में कई ऐसे बाबा पैदा हो गए हैं। जिनको हर चीज का सुबूत इस लिए खोजना है ताकि वे दुनिया की निगाह में हीरो बने रहें। यही उस बाबा और इन लोगों में मूलभूत अंतर है। बाबा खुद का अस्तित्व मानने से इंकार कर रहा है मगर ये लोग अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सुबूतों को खोजने पर आमादा हैं। यही कारण है कि इस देश में हर चीज को लेकर सियासत शुरू हो जाती है। देश के कुछ बयानवीरों की आदत बनती जा रही है। वे अपनी करनी से बाज़ नहीं आने वाले। अपना फटा पाजाम जिनको नहीं दिखाई देता मगर दूसरे के पैंट की पिन होल पर भी ऐसे नज़रें गड़ाते हैं गोया वो ब्लैकहोल हो? समझ में नहीं आता कि देश किस ओर जा रहा है। बयान के असल सरोकार से भी कोई मतलब नहीं रखा जाता बस बोलना था तो बोल दिया। उसका मतलब कुछ भी निकले, कोई फर्क नहीं है। ऐसे ही लोग अब सर्जिकल स्ट्राईक पर मांग रहे थे सेना से सुबूत तो सेना कोई नेता तो है नहीं। उसने सुबूत इनके थोबड़े पर दे मारा। अब सब की बोलती हो गई बंद, बेशर्मों की तरह अपना सा मुंह लेकर खड़े हो गए तो कुछ ने अपनी-अपनी कारों का कालाशीश चढ़ा लिया। अब ऐसे में सवाल तो ये है कि अब भारत माता पूछ रही है कि क्या ये नेता ईमानदार हैं?अगर हैं तो मेरे बहादुर बेटों की ईमानदारी का सुबूत पाने के बाद अपने-अपने कुकर्मो के सुबूत पेश करें और नैतिकता के आधार पर अपनी -अपनी कुर्सी छोड़ दें। ऐसे लोगों को कुर्सियों पर बने रहने का कोई भी अधिकार नहीं है, क्यों समझ गए न सर.... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर। तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जय....जय।
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