जिम्मेदार बने प्रशासन








सुराज की सरकार के अधिकारी कर्मचारी पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि सरकारी कार्यालयों में अराजकता जैसा माहौल दिखाई दे रहा है। इन अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा लगातार निर्दोष जनता को भोगना पड़ रहा है। तो कभी -कभी शासकीय कर्मचारियों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकारी मह$कमें में एक बात आम हो चली है कि काम करो या न करो वेतन उतना ही मिलना है। कुछ लोग उसी में पेंच निकाल कर नोट खींचने में भी लग जाते हैं। सरकार का तर्क था कि  महंगाई बढ़ती जा रही है। ऐसे में शासकीय कर्मचारियों की तन्ख़्वाह बढ़ा दी जाए, ताकि इन अधिकारियों के काम में तेजी आए और ये ईमानदारी से अपना काम कर सकें। तो वहीं जानकारों का तो ये भी मानना है कि सरकार चाहे तो इनको पांच सौवां वेतनमान दे -दे मगर ये कोई भी काम बिना लिए करने से रहे।
सरकार ने जिस तेजी से शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों , मंत्रियों, सांसदों विधायकों के साथ ही साथ तमाम लोगों के वेतन बढ़ा दिए। उसके अुनपात में दो प्रतिशत लोगों की जिम्मेदारी नहीं बढ़ाई गई। यदि ऐसा किया जाता तो आज जो परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं वे शायद न होतीं। मज़ाल है कि किसी सरकारी दफ्तर का बिना दस चक्कर लगाए कोई काम हो जाए? ऐसे में लोगों के मन में इस व्यवस्था के प्रति आक्रोश पनपता जा रहा है। सरकारी अधिकारियों को अब अपने काम की शैली में सुधार लाना होगा तो वहीं सरकार को भी उन्हें उनकी जिम्मेदारियां तय करनी होगी। बिना जिम्मेदारी के कोई काम नहीं होता। चाहे वो प्रधानमंत्री हो राष्ट्रपति हो या फिर कोई अदना सा कर्मचारी। जिम्मेदारियां सभी की तय होनी चाहिए। इसके साथ ही साथ ये भी देखना होगा कि कौन है जो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सलीके से नहीं कर रहा है और क्यों? जो जितनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करे उसी अनुपात में उसका वेतन बने, उसी के अनुपात में उसको सारी सुविधाएं दी जाएं। इससे एक ओर जहां देेश के खजाने पर बोझ कम आएगा तो वहीं लोगों को भी काफी राहत मिल सकेगी।

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