बात की करामात

खटर-पटर-

निखट्टू-
संतों... रहीम दास जी कह गए हैं कि बोली एक अमोल है जो कोई बोले जानि, हिए तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनि। कहने का तात्पर्य है कि बोली एक ऐसी अमूल्य वस्तु है कि इसको तोल कर ही बोलना चाहिए। लेकिन हमारे देश के नेता पहले बोल देते हैं। उसके बाद जब कोई उसको तोलता है तो ये गोल हो लेते हैं। ये इस मामले का सबसे बड़ा झोल है। ऐसे में इन लोगों को समझना चाहिए कि हमारे क्या बोलने का क्या मतलब निकाला जाएगा? बिना सोचे समझे बोलने का नतीजा है कि कई नेताओं पर देशद्रोह तक के मामले तक हो जाते हैं। तो वहीं कोई जिंदगी भर जनता का आदर्श  बना रहता है। इसी लिए कहते हैं कि बातन हाथी पाइए बातन हाथी पांव। यानि अच्छी बात किसी राजा से कह दो तो हो सकता है कि वो खुश होकर हाथी दे दे। और अगर कहीं नाखुश हुआ तो मार-मार कर पांव सुजा दे? बात को इसीलिए लोग अमूल्य वस्तु कहते हैं। इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि जो भी हम किसी से बोलें- मोल तोल कर ही बोलें।  इससे एक ओर जहां हम सुरक्षित रहेंगे तो वहीं दूसरी ओर उस आदमी को भी हमारी अहमियत का ध्यान रहेगा। महज एक वाक्य ही जहां गुरू द्रोणाचार्य के प्राण ले लेता है तो वहीं तमाम लोग हैं जिनको एक ही वाक्य से जिंदगी मिल चुकी है। इसलिए जब भी बोलें पूरा सोच विचार कर ही बोलें। नहीं तो क्या पता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह गाल बजा लें और बाद में कुछ निकले ही  न। तो फिर हंसी -हंसारत शुरू हो जाए? ऐसी बोली का क्या मतलब कि संजय निरुपम की तरह जो जी में आया बक दो उसके बाद चुप्पी साध लो? ये बोल लोगों के दिलों से इनको लगातार दूर करते जा रहे हैं। वो दिन दूर नहीं जब एक नेता चिल्लाता-चिल्लाता मर जाएगा मगर उसको सुनने के लिए कोई भी नहीं जाएगा। तो क्यों समझ गए न सर....अब हम भी निकल लेते हैं घर। कल फिर आपसे मुलाकात होगी...तब तक के लिए जय...जय।
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