चीन में बने सामानों का बहिष्कार
देश के सबसे बड़े थोक बाजार सदर बाजार की दर्जनों गलियों और हजारों दुकानों में एक चीज आम है, चीन में निर्मित सामान का विक्रय.. एक-डेढ़ दशक पहले तक इस बाजार में चीन में निर्मित सामान की हिस्सेदारी 30 फीसदी से भी कम थी, जो आज 60-70 फीसदी हो गई है। यह बाजार उत्तर भारत का वितरण केंद्र माना जाता है और यहां से कई छोटे बाजारों की रंगत तय होती है। चीन ने पिछले 20 सालों में अपने निर्यात को 15 गुना से भी ज्यादा बढ़ा लिया है। उसने 1970 के दशक में ही यह भांप लिया था कि उसके देश की विशाल जनसंख्या का विकास निर्यात से ही होगा। तो वहीं भारत में उसका जो निर्यात होता है उसका प्रतिशत काफी कम है। ऐसे में अगर भारत उससे आयात न भी करे तो उसकी अर्थव्यवस्था पर इसका ज्यादा नुकसान होने वाला नहीं है, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।
आर.पी.सिंह-
भारत में पिछले एक डेढ़ दशक से हर बाजार में चीन निर्मित वस्तुओ की धूम मची हुई हैं हालांकि चीन निर्मित वस्तुओं की कोई गारंटी नहीं होती और क्वालिटी भी घटिया होती हैं, लेकिन फिर भी चीन निर्मित वस्तुओ की बाजार में बहुत अच्छी खपत हो रही हैं । खिलौनों से लेकर लेखन-सामग्री तक, छाते से छड़ी तक, हर दुकान पर चीन में निर्मित माल का कब्जा है। त्योहारों के मौके पर नजारा चौंकाने वाला होता है। सजावटी रौशनी के लट्टू, लडिय़ा ही नहीं, लक्ष्मी-गणेश व अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों से लेकर दीया-बाती तक पर चीन में निर्मित माल की छाप होती है। देश के सबसे बड़े थोक बाजार सदर बाजार की दर्जनों गलियों और हजारों दुकानों में एक चीज आम है, चीन में निर्मित सामान का विक्रय.. एक-डेढ़ दशक पहले तक इस बाजार में चीन में निर्मित सामान की हिस्सेदारी 30 फीसदी से भी कम थी, जो आज 60-70 फीसदी हो गई है। यह बाजार उत्तर भारत का वितरण केंद्र माना जाता है और यहां से कई छोटे बाजारों की रंगत तय होती है। चीन ने पिछले 20 सालों में अपने निर्यात को 15 गुना से भी ज्यादा बढ़ा लिया है। उसने 1970 के दशक में ही यह भांप लिया था कि उसके देश की विशाल जनसंख्या का विकास निर्यात से ही होगा। तो वहीं भारत में उसका जो निर्यात होता है उसका प्रतिशत काफी कम है। ऐसे में अगर भारत उससे आयात न भी करे तो उसकी अर्थव्यवस्था पर इसका ज्यादा नुकसान होने वाला नहीं है, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।
उरी हमले के बाद पैदा भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुए तनाव के बाद कुछ लोग सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुप में चीनी सामान के बहिष्कार की मांग कर रहे हैं। ऐसे लोग इस बात से नाराज नजर आते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन पाकिस्तान को अपना दोस्त बताते हुए उसका पक्ष लेता नजर आता है। पिछले हफ्ते ही चीन ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादी घोषित करवाने की भारत की कोशिशों में अड़ंगा लगा दिया। उससे पहले चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी की तिब्बत से भारत होकर आने वाली एक सहायक नदी की धारा को रुकवा दिया। लोगों की भावनाएं चाहे जो हों पर रहकर सोचें तो क्या ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में चीन या किसी भी एक देश के सामान का पूरी तरह बहिष्कार संभव है? और क्या आम भारतीय के लिए ऐसा कर पाना आसान होगा? इस सवालों पर सोचने से पहले केवल स्मार्टफ़ोन बाजार से जुड़े ताजा आंकड़ों पर नजर डालें और सोचें कि चीनी सामान का बहिष्कार कितना संभव है।
इंटरनेशनल डॉटा कॉर्पोरेशन (आईडीसी) की साल 2016 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-मई-जून) की रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान भारत में कुल 2. 75 करोड़ स्मार्टफोनों की बिक्री हुई। बिक्री के आधार पर दूसरी तिमाही में चीनी कंपनी लेनोवो बाजार में सैमसंग (दक्षिण कोरियाई कंपनी) और माइक्रोमैक्स (भारतीय कंपनी) के बाद तीसरे नंबर पर रही। इस दौरान कुल बिके स्मार्टफोनों में 7. 7 प्रतिशत लेनोवो-मोटोरोला के थे। मोटोरोला को लेनोवो ने 2014 में खरीद लिया था। इस साल की दूसरी तिमाही में लेनोवो के अलावा तीन अन्य चीनी वेंडरों ने 10 लाख से अधिक स्मार्टफोन भारत में बेचे। इस तरह केवल चार चीनी कंपनियों ने मिलकर साल की दूसरी तिमाही में 50 लाख से अधिक स्मार्टफोन बेचे। ये आंकड़ा तो चीनी कंपनियों का है। अगर इसमें उन कंपनियों के स्मार्टफोनों की संख्या जोड़ दी जाए जो चीन में अपने उत्पाद बनवाती हैं तो ये संख्या और बढ़ जाएगी। यानी चीनी सामान का बहिष्कार करना है तो 50 लाख से अधिक भारतीयों को अपना महज छह महीना पुराना स्मार्टफोन फेंकना होगा। तो क्या आप हैं इसके लिए तैयार?
भारत स्मार्टफ़ोन का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय संस्था मॉर्गन स्टैनली की जून में प्रकाशित रिपोर्ट अनुसार भारत में 22 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन यूजऱ हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत का स्मार्टफ़ोन बाजार दुनिया में सबस तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो 2018 तक भारत स्मार्टफोन की संख्या के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया में दूसरे नंबर पर आ जाएगा। अभी स्मार्टफोन की खपत के मामले में दुनिया में सबसे आगे चीन है लेकिन वहां का बाजार अब सुस्त पड़ता जा रहा है। भारत का स्मार्टफोन बाजार चीन से कई गुना तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन मुश्किल ये है कि भारत स्मार्टफ़ोन का उपभोक्ता बनने में जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है उतनी तेजी से उसका उत्पादक बनने की तरफ नहीं बढ़ रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि भारतीय कंपनियां विश्व स्तरीय उत्पाद बनाने पर जोर दें ताकि देश के लोगों को किफायदी दाम में बेहतरीन सामान खरीदने के लिए विदेशी कंपनियों की तरफ न देखना पड़े।
------------------------------------------------
Comments