लीकतंत्र की लीक

खटर-पटर-

निखट्टू-

संतों....दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र आजकल लीक कर रहा है। यहां कुछ लोग सपनों से परेशान हैं तो कुछ लोग अपनों से। अच्छा ये अपने  पैसा लेकर ऐसा काम कर रहे हैं कि दुश्मन भी न करना चाहे। गरीब बेचारे तो यात्री गाडिय़ों में चना बेचते हैं। तो कुछ मक्कार लोग जल्दी अमीर होने की चाह में देश की गुप्त सूचना बेच रहे हैं। आए दिन कोई न कोई सूचना लीक हुई जा रही है। लोकतंत्र न होकर ये लीकतंत्र हो गया है? कभी कुछ लीक तो कभी कुछ। अरे... एक बार तो इसरो के सैटेलाइट के ईंधन टैंक में भी लीक हो गया था। आखिरी वक्त में उड़ान कैंसल करनी पड़ी थी। उसके बाद काफी सुधार करने के बाद उसको छोड़ा गया था। हालांकि उसने मिशन को बखूबी पूरा किया। एक दिन तो हद ही हो गई। जब देश की वायुसेना के लिए मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदी की महत्वपूर्ण फाइल दिल्ली की एक सड़क पर फेंकी मिली। किसी ने उसको देखा और गृहमंत्रालय पहुंचाया। हमारी पनडुब्बियों की सूचनाएं आस्ट्रेलिया पहुंच गईं।  इस लीक की लीक पर चलने वाले लीकतंत्र के कारण तो कहीं ऐसा न हो कि हमारा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाए। ये तो बड़े-बड़े होल हैं जिसको मैंने आपको दिखाया, क्या आपकी समझ में कुछ आया ? इसके अलावा  तो इतने लीक हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता। सोच तो हम ये भी नहीं सकते कि ये लोकतंत्र की ईमानदारी को जितना नोंच सकते हैं। आप जितना सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा ये लोकतंत्र को नोंचते हैं। वो भी इतनी बर्बरता से कि भेडि़ए और लकड़बघ्घे भी शरमा जाएं। इतनी बेदर्दी से तो वे भी किसी  को नहीं नोंचते। हद तो तब हो जाती है कि जब एक चोर को चोर साबित करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती है। एक घुसखोर  आराम से व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर अपनी नौकरी पूरी कर रिटायर्ड हो जाता है। कानून आंखें मंूदकर चुप्पी साधे तमाशा देखता रह जाता है। लोक ने तंत्र को ये अधिकार दे रखा है कि वो जब चाहे जितना चाहे मनमाने दाम पर आजादी को बेच सकता है। अपनी जरूरत के हिसाब से नोट खैंच सकता है। यही कारण है कि लोकतंत्र पर लीकतंत्र हावी हो चला है। अब जो उसकी चपेट में आता है अधिकारी की मुंहमांगी रकम चुकाता है। उसके बाद कहता है कि ये लीक ठीक नहीं है? अरे भइया जब सामने वाले अधिकारी ने फस्र्ट डिवीजन वाले को छोड़कर थर्ड डिवीजन वाले को ये नौकरी बेची थी तो उस रोज कहां थे आप? अब ये भी उसी की वसूली कर रहा है। आखिर उसके बाप ने अपना चार एकड़ खेत बेंचकर ये नौकरी खरीदी है। तनख्वाह से तो दो जन्मों में भी पूरा नहीं हो पाएगा। इसी लिए लीकतंत्र की जय लोग बिना भय के बोल रहे हैं। अपनी-अपनी औ$कात के हिसाब से लीक को तौल रहे हैं। समझ गए न सर... तो अब हम भी निकल लेते हैं अपने घर ...तो कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जै...जै।
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