धान के कटोरे में भीख




छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहां एशिया का सबसे बड़ा धान के जर्मोप्लाज़्म का बैंक भी है। प्रदेश में लगातार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इसका प्रमुखकारण है राज्य की भ्रष्ट अफसरशाही। केंद्र सरकार और राज्य सरकार की योजनाओं में आए पैसे को किसानों के कटोरे में पहुंचने के पहले ही सरकारी अफसर उस पर झपट्टा मार देते हैं। किसाने के हिस्से की सुविधाओं को शान से खाते हैं और उसके कटोरे में डाल दी जाती है दिखावे की भीख। ऐसे ही अधिकारी- लोगों को देते हैं कानून -व्यवस्था की सीख। अफसरशाही की लापरवाही का आलम तो यहां तक है कि किसानों को कभी एक रुपए तो  कभी पांच रुपए का चेक दिया जाता है। पांच-पांच सौ रुपए खर्च कर पिछले साल जिन किसानों ने अपनी-अपनी फसलों का बीमा  करवाया था। जब राज्य में सूखा पड़ा तो सरकार ने अपने नाक बचाने के लिए किसी को एक तो किसी को पांच और किसी को चालीस, अस्सी और एक सौ पैंसठ रुपए के चेक थमाए। ऐसे में सरकारी पैसों की राज्य में कैसे बंदरबांट हो रही है ये बात आसानी से समझ में आ जाती है। जानकारों का तो ये भी मानना है कि सरकार चाहे जितनी भी योजनाएं बना ले मगर जब तक उनका कठोरता से क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक किसानों को उनका हक नहीं मिलने वाला। राज्य की अफसरशाही की एक विशेषता ये भी है कि ये वातानुकूलित कमरों में बैठे-बैठे कागजी घोड़े दौड़ाने में पूरी तरह उस्ताद हैं।
किसान देश का अन्नदाता कहा जाता है, मगर यदि वही अन्नदाता लगातार फांसी लगाकर खुदकु़शी करता रहा तो फिर एक दिन ऐसा आएगा कि लोगों को सिर्फ अन्न के सपने आएंगे।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि जब वो ऐसे अधिकारियों को सातवां वेतनमान दे रही है तो उनकी जिम्मेदारी  भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। ताकि वे फाइलों को टरकाएं नहीं बल्कि निपटाएं। लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। बातें बहुत हो चुकी, अब काम होना चाहिए। लोग अब परिणाम देखना चाहते हैं बातें सुनना नहीं। सरकार को इस बात को गंभीरता से समझना होगा। यदि ऐसा करने में सरकार नाकाम रहेगी तो जनता चुनाव में उसको भी सबक सिखा देगी  इसमें कोई दो राय नहीं है।

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