काकी खींचू टांग
खटर-पटर
निखट्टू-
संतों..... हमारे देश में गुरू की महिमा बहुत बड़ी मानी गई है। विशेष कर हमारे संत कबीरदास ने तो साफ-साफ कह दिया कि- गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।। यानि कबीरदास जी कहते हंै कि अगर गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो सबसे पहले गुरु का चरण स्पर्श करना चाहिए, जिन्होंने भगवान के बारे में हमें ज्ञान दिया। ये तो गुरुओं की बात थी। वे समर्पित गुरु हुआ करते थे। आजकल तो गुरु कम गुरूघंटाल ज्यादा मिलते हैं। ये तथाकथित गुरु ऐसे -ऐसे कर्म करते हैं कि बताने में भी शर्म महसूस होती है। कहीं बच्चों का पेट काटकर अपनी टेंट में डाल लेते हैं। तो कहीं दारू पीकर पढ़ाने पहुंच जाते हैं। वेतनमान सातवां चाहिए मगर काम एकन्नी का नहीं करेंगे। अब ऐसे गुरू घंटालों से आखिर कौन निपटेगा? आज सुबह-सुबह ही एक बच्चा बड़े प्रेम से रट रहा था कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काकी खींचूं टांग..... सुनकर मैं चौंक गया? मैंने उससे कहा तुमको पता है कि ये दोहा किसका है? बच्चे ने ना में सिर हिला दिया। मैंने कहा कि ये दोहा संत कबीरदास का है। उसने हंसते हुए कहा अंकल....उन्होंने उस जमाने के गुरुओं के लिए लिखा होगा। हम आज वाले गुरुओं के लिए लिखे हैं। सूफी तो यहां तक कहते हैं कि - कागा सब अंग खाइयो, नोंच-नोंच कर मांस, दो नैना मत खाइयो कि पिया मिलन की आस। यहां वो पिया...शब्द भी गुरू के लिए आया है। तब तक बच्चा बोल पड़ा जेब्बात... अंकल... बिल्कुल उस लिखने वाले को हमारे स्कूलों की स्थिति की जानकारी रही होगी। पिया...यानि गुरू.... अब हमारे स्कूलों में भी तो गुरू आपको पिए हुए ही मिलेंगे। सुनकर लगा कि अपना सिर पीट लूं, मगर उसकी सच्चाई को भी तो नकार नहीं सकता था। लिहाजा उसका कुतर्क सुनना पड़ा। बच्चे ने फिर कहा कि आपके जमाने में गुरु जी आते थे। हमारे जमाने में तो गोरू जी हो चले हैं। अभी कुछ स्कूलों में इन तथाकथित शिक्षकों ने जिस तरह का काम किया है। उससे ये गुरू कम गोरू ज्यादा लगते हैं। विश्वास मानिये जिस दिन ये अपना चरित्र सुधार लेंगे इनकी फिर से पूजा शुरू हो जाएगी, मगर अभी तो फिलहाल इनकी पूजा थाने में पुलिस कर रही है। उसके बाद अदालत इनको जेल में ठेल देगी। ये गुरू अगर गुरू रहे होते तो इनकी जिंदगी शक्कर जैसी मीठी होती। मान-सम्मान और पैसा तीनों मिलता मगर इन्होंने खराब कर्म करके अपना और अपने परिवार का भाग्य खराब कर दिया है। ऐसे में इनको गोरू नहीं तो भला और क्या कहें? उतने छोटे से बच्चे की इतनी ऊंची बातें सुनकर मेरा गर्व से ऊंचा हो गया सर.... तो अब हम निकल लेते हैं अपने घर...कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जै....जै।
निखट्टू-
संतों..... हमारे देश में गुरू की महिमा बहुत बड़ी मानी गई है। विशेष कर हमारे संत कबीरदास ने तो साफ-साफ कह दिया कि- गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।। यानि कबीरदास जी कहते हंै कि अगर गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो सबसे पहले गुरु का चरण स्पर्श करना चाहिए, जिन्होंने भगवान के बारे में हमें ज्ञान दिया। ये तो गुरुओं की बात थी। वे समर्पित गुरु हुआ करते थे। आजकल तो गुरु कम गुरूघंटाल ज्यादा मिलते हैं। ये तथाकथित गुरु ऐसे -ऐसे कर्म करते हैं कि बताने में भी शर्म महसूस होती है। कहीं बच्चों का पेट काटकर अपनी टेंट में डाल लेते हैं। तो कहीं दारू पीकर पढ़ाने पहुंच जाते हैं। वेतनमान सातवां चाहिए मगर काम एकन्नी का नहीं करेंगे। अब ऐसे गुरू घंटालों से आखिर कौन निपटेगा? आज सुबह-सुबह ही एक बच्चा बड़े प्रेम से रट रहा था कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काकी खींचूं टांग..... सुनकर मैं चौंक गया? मैंने उससे कहा तुमको पता है कि ये दोहा किसका है? बच्चे ने ना में सिर हिला दिया। मैंने कहा कि ये दोहा संत कबीरदास का है। उसने हंसते हुए कहा अंकल....उन्होंने उस जमाने के गुरुओं के लिए लिखा होगा। हम आज वाले गुरुओं के लिए लिखे हैं। सूफी तो यहां तक कहते हैं कि - कागा सब अंग खाइयो, नोंच-नोंच कर मांस, दो नैना मत खाइयो कि पिया मिलन की आस। यहां वो पिया...शब्द भी गुरू के लिए आया है। तब तक बच्चा बोल पड़ा जेब्बात... अंकल... बिल्कुल उस लिखने वाले को हमारे स्कूलों की स्थिति की जानकारी रही होगी। पिया...यानि गुरू.... अब हमारे स्कूलों में भी तो गुरू आपको पिए हुए ही मिलेंगे। सुनकर लगा कि अपना सिर पीट लूं, मगर उसकी सच्चाई को भी तो नकार नहीं सकता था। लिहाजा उसका कुतर्क सुनना पड़ा। बच्चे ने फिर कहा कि आपके जमाने में गुरु जी आते थे। हमारे जमाने में तो गोरू जी हो चले हैं। अभी कुछ स्कूलों में इन तथाकथित शिक्षकों ने जिस तरह का काम किया है। उससे ये गुरू कम गोरू ज्यादा लगते हैं। विश्वास मानिये जिस दिन ये अपना चरित्र सुधार लेंगे इनकी फिर से पूजा शुरू हो जाएगी, मगर अभी तो फिलहाल इनकी पूजा थाने में पुलिस कर रही है। उसके बाद अदालत इनको जेल में ठेल देगी। ये गुरू अगर गुरू रहे होते तो इनकी जिंदगी शक्कर जैसी मीठी होती। मान-सम्मान और पैसा तीनों मिलता मगर इन्होंने खराब कर्म करके अपना और अपने परिवार का भाग्य खराब कर दिया है। ऐसे में इनको गोरू नहीं तो भला और क्या कहें? उतने छोटे से बच्चे की इतनी ऊंची बातें सुनकर मेरा गर्व से ऊंचा हो गया सर.... तो अब हम निकल लेते हैं अपने घर...कल फिर आपसे मुलाकात होगी तब तक के लिए जै....जै।
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