बिल्डर्स पर कार्रवाई से क्यों डर रही सरकार




राजधानी में बढ़ती बिल्डर्स की मनमानी ने लोगों को परेशानी में डाल रखा है।  शहर के नामी बिल्डर संजय वाजपेयी पर कार्रवाई के बाद से तीन सालों के भीतर राजधानी तो क्या पूरे राज्य में किसी भी बिल्डर पर कार्रवाई नहीं हुई। जब कि ये पजेशन देने और अवैध जमीन हथियाने में माहिर होते हैं।  कइयों के ऊपर तो थानों में शिकायतें भी दर्ज हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि आखिर  बिल्डर्स पर कार्रवाई करने में सरकार क्यों डर रही है?
क्या देश का कानून सिर्फ गरीबों और असहायों के लिए बना है?
रायपुर।
क्या था पूरा मामला-
राजधानी के नामी बिल्डर संजय वाजपेयी पर स्वागत विहार मामले में आरडीए द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को राज्य की हाईकोर्ट ने नकार दिया था। इसके बाद श्री वाजपेयी ने अपने ग्राहकों को संतुष्ट करना भी शुरू कर दिया था।  जिन 255 लोगों के भूखंडों को जांच एजेंसियों ने सरकारी जमीन घोषित किया था, नगर निगम और रायपुर विकास प्राधिकरण जैसी सरकारी एजेंसियां इस मामले में कोई राहत नहीं दे पाई थीं।  कानूनविदों का कहना है कि बिल्डर संजय वाजपेयी की असामायिक मृत्यु के बाद उनके खिलाफ दर्ज मामले तो खत्म होंगे ही, स्वागत विहार के पीडि़त लोगों के मामले में सरकारी एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।
हाईकोर्ट ने दिया था पक्ष में फैसला-
इस मामले में राज्य की हाईकोर्ट ने बिल्डर वाजपेयी के पक्ष में फैसला दिया था। इसमें राज्य सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी।
एसआईटी बनते ही पुलिस ने केस डायरी खंगाली-
उच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्य सरकार ने अपनी नाक बचाने का नया नुस्खा निकाला। उसने एसआईटी का गठन कर दिया। कहते हैं  कि हड़बड़ी में इंसान अक्सर गड़बड़ी करता है। यहां भी वही देखने को मिला गठन की घोषणा होते ही टीम में शामिल पुलिस अफसरों ने स्वागत विहार की जमीनों से संबंधित फाइलों को खंगाल डाला। करीब तीन चार घंटे तक अफसरों ने स्वागत विहार मामले की केस डायरी और चालान की कॉपी का अध्ययन भी किया। चालान में कौन-कौन सी कमियां रह गईं हैं, इसका परीक्षण करने के साथ अफसरों ने कुछ बिंदु तय किए थे। उन्होंने स्वागत विहार में जमीन लेने वालों की सूची भी देखी।
बिल्डर ने भी प्रोजेक्ट पर शुरू कर दिया था काम
बिल्डर वाजपेयी ने प्रोजेक्ट को लेकर काम शुरू कर दिया था। इस दौरान उनके प्रोजेक्ट में जमीन लेने वाले कुछ ऐसे लोग जो उनसे पैसे मांग रहे थे, उन्होंने उनके पैसे भी लौटाने शुरू कर दिए थे। जमीन लेने वालों को उन्होंने आश्वासन दिया था कि उन्हें हर हाल में जमीन दी जाएगी। ऐसे लोग बड़ी संख्या में थे जिन्होंने बिल्डर पर भरोसा जताते हुए उनसे पैसे नहीं मांगे थे और आश्वस्त थे कि उन्हें प्लॉट मिल जाएंगे। इसके बाद उनको हार्ट अटैक आया और उनकी मौत हो गई।
खुद को बताते रहे बेगुनाह-
संजय वाजपेयी ने भी कई बार खुद को बेकसूर बताया, मगर अधिकारियों ने  उनकी एक नहीं सुनीं। जानकारों की मानें तो उनको जमकर प्रताडि़त किया गया।
सवालों के घेरे में सरकार-
उस मामले के तीन साल बाद आज तक ये सरकार एक भी बिल्डर पर कार्रवाई नहीं कर पाई। जब कि राजधानी में डेढ़ सौ से ज्यादा बिल्डर धड़ल्ले से अपना काम कर रहे हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि  क्या सरकार ऐसे बिल्डर्स पर कार्रवाई करने से डर रही है?
ऊंची पहुंच के चलते नहीं होती कार्रवाई-
राजधानी के जानकारों का मानना है कि यहां के बिल्डर्स के संपर्क नई दिल्ली के तमाम रसूखदारों तक हैं। ऐसे में इन पर कार्रवाई करने से पहले कोई तीन बार सोचता है। ऊंची पहुंच का फायदा इनको मिल रहा है।
आखिर कब होगी कार्रवाई-
राजधानी की जनता ये जानना चाहती है कि आखिर इन रसूखदारों पर राज्य सरकार कब कार्रवाई करेगी?
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