कहां है समान कानून
सुराज की सरकार चाहे कितने ही दावे कर ले मगर कुछ तो ऐसा है जिससे उसकी प्रतिष्ठा पर सवालिया निशान लग रहा है। कहा जाता है कि लोकतंत्र में सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं, मगर यहां तो देखने में कुछ और ही दिखाई दे रहा है। सरकार का व्यवहार सभी के साथ एक जैसा नहीं है। इसका जीता जागता नमूना राजधानी में ही देखने को मिल गया। यहां के एक नामी बिल्डर को राज्य सरकार के कुछ अधिकारियों ने जमकर प्रताडि़त किया। वो भला आदमी गिरफ्तार भी हुआ। सलाखों के पीछे भी गया, मगर उच्च न्यायालय ने उसको बरी कर दिया। इसके बाद सरकारी अधिकारियों को अपनी नाक कटती सी लगी। उन्होंने तत्काल ही एसआईटी गठित कर दी। ये सदमा वो आदमी झेल नहीं सका और हृदयाघात से उसकी मौत हो गई। इस राजनीतिक हत्या के बाद से लेकर आज तक राजधानी के किसी भी बिल्डर पर सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि क्या उस व्यक्ति पर कार्रवाई किसी भेदभाव के तहत की गई थी? इस मामले में उस समय नगर निगम में कांग्रेस सत्ता में थी। तो वहीं भाजपा विपक्ष में। इन दोनों में भी वाचिक टकराव हुआ था। तो उसके बाद से लेकर आज तक किसी भी बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इस सवाल का जवाब राज्य सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के पास नहीं है। बताया तो ये भी जा रहा है कि ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि इन तमाम बिल्डर्स के तार दिल्ली दरबार में बैठे बड़े साहबों से जुड़े हैं। सरकार अगर वास्तव में सबके लिए समान कानून की बात करती है तो अब तक ऐसे लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? राज्य का आम नागरिक भी इस बात को जानना चाहता है, कि आखिर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? क्या ये कुछ लोग कानून से ऊपर हैं? कहां है सब के लिए समान कानून? सरकार को चाहिए कि तत्काल ऐसे लोगों के खिलाफ जांच दल का गठन कर इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो सके।
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